सर्विस बेनिफिट्स के लिए 'सम्मानजनक बरी होने' और 'अन्य तरह से बरी होने' में कोई अंतर नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट का सस्पेंशन पीरियड के लिए पूरी सैलरी देने का आदेश

  • सर्विस बेनिफिट्स के लिए सम्मानजनक बरी होने और अन्य तरह से बरी होने में कोई अंतर नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट का सस्पेंशन पीरियड के लिए पूरी सैलरी देने का आदेश

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सस्पेंड किए गए कर्मचारी को सर्विस बेनिफिट्स देने के मामले में 'सम्मानजनक बरी होने' (Honourable Acquittal) और 'बरी होने' (acquittal) के बीच कानूनी रूप से कोई अंतर नहीं है।

    जस्टिस आनंद शर्मा की बेंच ने LIC (प्रतिवादी) का वह आदेश रद्द किया, जिसके तहत याचिकाकर्ता को सस्पेंशन के समय के सर्विस बेनिफिट्स देने से मना कर दिया गया था। याचिकाकर्ता को एक आपराधिक मामले में फंसाए जाने के कारण सस्पेंड किया गया। बाद में वह बरी हो गया, लेकिन उसे बेनिफिट्स इसलिए नहीं दिए गए क्योंकि उसका बरी होना "सम्मानजनक" नहीं माना गया।

    कोर्ट ने कहा कि लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (स्टाफ) रूल्स, 1960 (रूल्स) में सम्मानजनक बरी होने और किसी अन्य कारण से बरी होने के बीच कोई अंतर नहीं किया गया। किसी भी स्थिति में बरी होने पर कर्मचारी के निर्दोष होने की धारणा बहाल हो जाती है।

    बता दें, याचिकाकर्ता LIC में क्लर्क के तौर पर काम कर रहा था, जब उसके खिलाफ एक आपराधिक मामला दर्ज किया गया और उसे सस्पेंड कर दिया गया। उसके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई। आखिरकार, याचिकाकर्ता को आपराधिक मामले में 'संदेह का लाभ' (Benefit of Doubt) देते हुए बरी कर दिया गया।

    याचिकाकर्ता का सस्पेंशन ऑर्डर रद्द किया गया और शुरू में उसके सस्पेंशन पीरियड को ड्यूटी पर बिताया गया समय माना गया, जिसके लिए वह पूरी सैलरी और भत्ते पाने का हकदार था।

    हालांकि, इसके तुरंत बाद यह आदेश रद्द कर दिया गया और एक नया आदेश जारी किया गया, जिसके तहत उस समय को 'अनुपस्थिति की अवधि' (Absence Period) माना गया और याचिकाकर्ता को उस अवधि के लिए सर्विस बेनिफिट्स का हकदार नहीं माना गया। इस आदेश को चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस आदेश का कारण यह बताया गया कि उसका बरी होना सम्मानजनक नहीं है।

    प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि सस्पेंशन पीरियड के साथ व्यवहार सभी मामलों में एक जैसा नहीं हो सकता, जहां कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक आरोपों का निपटारा अलग-अलग तरीकों से हुआ हो। जहां सस्पेंशन का एकमात्र आधार आपराधिक मामले का लंबित होना है, वहां सस्पेंशन पीरियड के बेनिफिट्स आपराधिक मुकदमे के अंतिम नतीजे पर निर्भर करते हैं। दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि सर्विस से जुड़े फ़ायदे देने के मामले में सम्मानजनक बरी होने और किसी अन्य कारण से बरी होने के बीच कोई फ़र्क नहीं है।

    इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अगर किसी दोषी कर्मचारी को 'प्रोबेशन ऑफ़ ऑफ़ेंडर्स एक्ट, 1958' के तहत फ़ायदे दिए गए तो दोषी ठहराए जाने के बावजूद, 1958 के एक्ट की धारा 12 के तहत उसे सर्विस से जुड़े सभी फ़ायदे मिलने चाहिए।

    बता दें, कोर्ट ने कहा,

    “यह स्थिति काफ़ी अजीब और कानूनी रूप से गलत होगी, जहां एक तरफ़ याचिकाकर्ता जैसा व्यक्ति है, जिसे सभी आपराधिक आरोपों से बरी कर दिया गया। फिर भी रेस्पॉन्डेंट्स ने उसके बरी होने को 'सम्मानजनक' न बताकर फ़ायदे रोक दिए हैं। दूसरी तरफ़ किसी दूसरे कर्मचारी के रिकॉर्ड में दोषसिद्धि (Conviction) कायम रहने के बावजूद, सक्षम कोर्ट ने उसे प्रोबेशन का फ़ायदा दिया तो उसे उसकी सर्विस की शर्तों से मिलने वाले फ़ायदों से वंचित नहीं किया जा सकता, जिसमें सस्पेंशन की अवधि के दौरान मिलने वाले फ़ायदे भी शामिल हैं।”

    इसके अनुसार, याचिका मंज़ूर की गई और यह माना गया कि याचिकाकर्ता अपनी सस्पेंशन की अवधि को सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए ड्यूटी पर बिताई गई अवधि के तौर पर मानने का हकदार है, जिसमें पूरी सैलरी और अलाउंस भी शामिल हैं।

    Case Title : Ram Pal Meena v Life Insurance Corporation of India & Ors

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