आगे की जांच का आदेश देते समय बताई गई वजहों को 'पॉइंट-वाइज़' जांच का निर्देश नहीं माना जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
Shahadat
5 Sept 2026 8:16 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि यह सच है कि कोर्ट पुलिस को किसी खास तरीके से जांच करने का निर्देश नहीं दे सकता, लेकिन आगे की जांच का आदेश देते समय कोर्ट द्वारा बताई गई वजहों को खुद 'पॉइंट-वाइज़' (बिंदुवार) जांच का निर्देश नहीं माना जाना चाहिए।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करने की मांग की गई, जिसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज मामले में आगे की जांच का निर्देश दिया गया।
बेंच ने कहा,
"इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने आगे की जांच की मांग वाली अर्जी पर विचार करते हुए पाया कि जांच एजेंसी ने नेगेटिव फाइनल रिपोर्ट दाखिल करते समय ज़रूरी दस्तावेज़ों, खासकर वोटर लिस्ट और संबंधित पट्टों के संबंध में जांच नहीं की। यह भी पाया गया कि संबंधित सामग्री को FSL जांच के लिए नहीं भेजा गया।
जांच के संबंध में इन बातों को ध्यान में रखते हुए और आवेदक द्वारा उठाए गए बिंदुओं पर विचार करते हुए मजिस्ट्रेट ने पाया कि मामले में आगे की जांच ज़रूरी थी। मजिस्ट्रेट ने अर्जी मंज़ूर करते हुए न तो जांच एजेंसी को जांच का कोई खास तरीका या ढंग अपनाने का निर्देश दिया और न ही जांच अधिकारी से किसी खास रूप या तरीके से रिपोर्ट जमा करने को कहा। ऐसे हालात में मजिस्ट्रेट द्वारा बताई गई वजहों को 'पॉइंट-वाइज़' जांच का निर्देश नहीं माना जा सकता।"
याचिकाकर्ता के खिलाफ धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के अपराधों के लिए मामला दर्ज किया गया, जिसमें पुलिस ने नेगेटिव रिपोर्ट दाखिल की थी। शिकायतकर्ता ने आगे की जांच की मांग करते हुए एक अर्जी दाखिल की, जिसे मजिस्ट्रेट ने मंज़ूर कर लिया।
याचिकाकर्ता का कहना था कि अर्जी मंज़ूर करते समय मजिस्ट्रेट ने जांच करने का एक खास तरीका तय किया था, जो कानून के तहत सही नहीं है।
यह तर्क दिया गया कि आगे की जांच का आदेश देने की अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट जांच एजेंसी को किसी खास या 'पॉइंट-वाइज़' तरीके से जांच करने का निर्देश नहीं दे सकता, क्योंकि जांच का तरीका और ढंग पूरी तरह से जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में आता है।
दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा,
“इस तरह की जांच कैसे की जाएगी, यह पूरी तरह से जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में आता है। संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) की जांच करना पुलिस का कानूनी काम है, जो CrPC के चैप्टर XII (अब BNSS का चैप्टर XIII) के तहत उन्हें सौंपा गया। कोर्ट आम तौर पर जांच के तरीके की निगरानी या निर्देश नहीं दे सकता... न ही जांच अधिकारी को कोई खास सबूत इकट्ठा करने, जांच का कोई खास तरीका अपनाने या किसी खास तरीके से रिपोर्ट जमा करने का निर्देश दे सकता है।”
कोर्ट ने कहा कि साथ ही इस सिद्धांत को एक और स्थापित सिद्धांत के साथ संतुलित करना ज़रूरी है कि हर न्यायिक आदेश में कारण बताए जाने चाहिए ताकि यह पता चले कि उस पर सोच-समझकर निर्णय लिया गया।
कोर्ट ने बताया कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने देखा कि जांच एजेंसी ने कुछ ज़रूरी दस्तावेज़ों, खासकर वोटर लिस्ट और संबंधित पट्टों के बारे में जांच नहीं की। इसके अलावा, यह भी देखा गया कि संबंधित सामग्री को FSL जांच के लिए नहीं भेजा गया।
यह माना गया कि मजिस्ट्रेट ने आगे की जांच की अर्ज़ी मंज़ूर करते समय यही कारण बताए, और उन्होंने जांच अधिकारी को जांच का कोई खास तरीका या ढंग अपनाने का निर्देश नहीं दिया।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा बताए गए कारणों को बिंदु-वार जांच के निर्देश के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
इसलिए याचिका खारिज कर दी गई।
Title: Rajendra Kumar v State of Rajasthan


