आत्महत्या मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने टीचर्स को दी राहत, कहा- छात्रा को पढ़ाई और उपस्थिति को लेकर डांटना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं

Amir Ahmad

28 July 2026 12:07 PM IST

  • आत्महत्या मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने टीचर्स को दी राहत, कहा- छात्रा को पढ़ाई और उपस्थिति को लेकर डांटना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं

    राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी छात्र या छात्रा को अनियमित उपस्थिति, कमजोर शैक्षणिक प्रदर्शन या अनुशासनहीनता के लिए डांटना अथवा अनुशासनात्मक कार्रवाई करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता।

    अदालत ने कहा कि जब तक आत्महत्या के लिए उकसाने, जानबूझकर सहायता करने या आवश्यक आपराधिक मंशा का स्पष्ट प्रमाण न हो, तब तक ऐसा मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 305 के तहत नहीं बनता।

    जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने कक्षा 12 की एक छात्रा की आत्महत्या के मामले में शिक्षकों के खिलाफ धारा 305 के तहत तय आरोपों को रद्द कर दिया।

    अदालत ने कहा,

    "शिक्षक का दायित्व है कि वह विद्यालय में अनुशासन बनाए रखे। किसी छात्र को अनियमित उपस्थिति, कमजोर पढ़ाई या अनुशासनहीनता के लिए डांटना या समझाना उसके पेशेगत कर्तव्यों का हिस्सा है। ऐसे कृत्यों को किसी भी स्थिति में आत्महत्या के लिए उकसाना या जानबूझकर सहायता करना नहीं माना जा सकता।"

    मामले में छात्रा के पिता ने शिकायत दर्ज कराई कि शिक्षकों द्वारा उनकी बेटी को लगातार प्रताड़ित और अपमानित किया जाता था तथा उसे स्कूल से निकालने की कोशिश की जा रही थी। इसी कारण उसने फंदा लगाकर आत्महत्या की। शिकायत के अनुसार, छात्रा एक सुसाइड नोट भी छोड़ गई।

    वहीं, शिक्षकों की ओर से अदालत को बताया गया कि पुलिस जांच में उनके खिलाफ आरोप सही नहीं पाए गए। जांच में सामने आया कि छात्रा नियमित रूप से कक्षाओं में नहीं आती थी और पढ़ाई में भी ध्यान नहीं देती थी। इसी कारण शिक्षकों ने उसे कई बार समझाया और डांटा, जिससे वह मानसिक रूप से परेशान हो गई।

    शिक्षकों ने यह भी दलील दी कि धारा 305 के तहत अपराध तभी बनता है, जब पहले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 107 के तहत दुष्प्रेरण के आवश्यक तत्व, जैसे उकसाना या जानबूझकर सहायता करना, साबित हों। इस मामले में ऐसा कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है।

    सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसी ने पाया कि छात्रा नियमित रूप से स्कूल नहीं आ रही थी। शिक्षकों ने उसे बार-बार कक्षाओं में उपस्थित रहने, पढ़ाई पर ध्यान देने और नियमित परीक्षा देने की सलाह दी थी। साथ ही यह भी कहा गया था कि यदि उसकी अनुपस्थिति जारी रही तो वह अपने पिता को स्कूल लेकर आए।

    हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रथम दृष्टया साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि शिक्षकों ने छात्रा को आत्महत्या के लिए उकसाया, कोई सकारात्मक कदम उठाया या ऐसी परिस्थितियां पैदा कीं कि उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प न बचा हो।

    अदालत ने स्पष्ट किया कि शिक्षक का कर्तव्य केवल पढ़ाना ही नहीं बल्कि अनुशासन बनाए रखना और छात्रों का शैक्षणिक मार्गदर्शन करना भी है। इसलिए ऐसे सामान्य अनुशासनात्मक कदमों को आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण नहीं माना जा सकता।

    इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने शिक्षकों की पुनरीक्षण याचिकाएं स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ तय किए गए आरोप रद्द कर दिए।

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