राजस्थान हाईकोर्ट ने ART Act के तहत तय उम्र सीमा बरकरार रखी, दिया यह तर्क

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने ART Act के तहत तय उम्र सीमा बरकरार रखी, दिया यह तर्क

    राजस्थान हाईकोर्ट ने 'असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021' (ART Act) की धारा 21(g) के तहत तय उम्र सीमा की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। कोर्ट का मानना ​​है कि इस कानून का मकसद मेडिकल मदद से माता-पिता बनने की इच्छा और बच्चे के कल्याण व भलाई को सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाना है।

    जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने कहा कि किसी प्रावधान को सिर्फ इसलिए असंवैधानिक (अल्ट्रा-वायर्स) नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह किसी को अयोग्य ठहराता है; बशर्ते उस अयोग्यता का उस उद्देश्य से सीधा संबंध हो जिसे हासिल किया जाना है। इस मामले में यह प्रावधान माँ और बच्चे दोनों के कल्याण के उद्देश्य से जुड़ा हुआ है।

    इस एक्ट की धारा 21(g) में 'असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी' (ART) सेवाओं का लाभ लेने के लिए उम्र की सीमा तय की गई- महिलाओं के लिए 21 से 50 साल और पुरुषों के लिए 21 से 55 साल।

    याचिकाकर्ता ऐसे विवाहित जोड़े थे, जिनमें से या तो पत्नी या पति की उम्र तय सीमा से अधिक हो गई। इससे परेशान होकर उन्होंने कोर्ट में इस प्रावधान को चुनौती दी थी।

    दलील दी गई कि उम्र सीमा तय करना मनमाना है, क्योंकि यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और बच्चे को जन्म देने के अधिकार को सीमित करके संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन करता है।

    इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि इससे अविवाहित (सिंगल) महिला और विवाहित महिला के बीच एक असमान वर्गीकरण पैदा होता है। जहां एक अविवाहित महिला तय उम्र सीमा के भीतर होने पर इन सेवाओं के लिए पात्र हो सकती है, वहीं एक विवाहित महिला, भले ही वह खुद तय उम्र सीमा के भीतर हो, उसे इन सेवाओं से वंचित किया जा सकता है, अगर उसके पति की उम्र तय सीमा से ज्यादा हो गई हो।

    इसके विपरीत, राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह प्रावधान रेगुलेटरी (नियामक) प्रकृति का है और किसी व्यक्ति को होने वाली निजी कठिनाई के आधार पर इसे असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता। सरकार ने कहा कि ये पाबंदियाँ बच्चे के कल्याण, उसके सर्वोत्तम हितों, सुरक्षा और भलाई को प्राथमिकता देने के लिए लगाई गई हैं। पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के 31 मार्च, 2023 के उस निर्देश को देखा, जिसमें आयु सीमा तय करने के कारणों के बारे में बताया गया था।

    कोर्ट ने इस पर टिप्पणी की:

    “इन कारणों को देखने से पता चलता है कि ऊपरी आयु सीमा तय करने के पीछे एक मुख्य विचार यह है कि माता-पिता बनने का मतलब है बच्चे के पालन-पोषण के दौरान उसे लगातार देखभाल, सहारा और एक स्थिर माहौल देना। इसमें भारत में जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy) और माँ तथा बच्चे दोनों के स्वास्थ्य से जुड़े खतरों का भी जिक्र है। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि भले ही संतान न होने वाले जोड़ों का माता-पिता बनने की इच्छा रखना एक महत्वपूर्ण बात है, लेकिन ART सेवाओं के जरिए पैदा होने वाले बच्चे के हितों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए कानूनी ढांचे का मकसद चिकित्सा सहायता से माता-पिता बनने की इच्छा और बच्चे के कल्याण व भलाई सुनिश्चित करने की जरूरत के बीच संतुलन बनाना है।”

    इसके अलावा, कोर्ट ने 'जेशी सी.ओ. बनाम भारत संघ और अन्य' मामले में केरल हाईकोर्ट की टिप्पणियों का हवाला दिया। उस मामले में, गोद लेने के इच्छुक माता-पिता के लिए आयु सीमा की वैधता की जांच करते समय यह कहा गया था कि माता-पिता के अधिकार सबसे ऊपर नहीं हैं, बल्कि जिस बच्चे को गोद लिया जाना है, उसका सर्वोत्तम हित (Best Interest) सबसे महत्वपूर्ण है।

    इस पृष्ठभूमि में, कोर्ट ने माना कि आयु सीमा का बच्चे और माँ के कल्याण के उद्देश्य से सीधा संबंध है। इसलिए आयु से जुड़ी ये पाबंदियां मनमानी नहीं हैं और न ही ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन करती हैं।

    इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि इस कानून में 'महिला' की परिभाषा में अविवाहित/अकेली महिला और विवाहित महिला के बीच कोई अंतर नहीं किया गया है। इसका मतलब यह है कि एक विवाहित महिला भी अकेले इस कानून के तहत सेवाओं का लाभ उठा सकती है, भले ही उसके पति की उम्र तय सीमा से ज्यादा हो गई हो—बशर्ते पति निर्धारित तरीके से अपनी सहमति दे दे।

    कोर्ट ने आगे कहा कि इस बात की पुष्टि 'असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) रूल्स, 2022' (जिन्हें 'रूल्स' कहा गया है) के नियम 13 से भी होती है, जो यह मानता है कि इस कानून के तहत दी जाने वाली प्रक्रियाओं का लाभ कोई जोड़ा (couple) या कोई अकेली महिला भी उठा सकती है।

    खंडपीठ ने कहा,

    “विवादास्पद प्रावधान अपने आप में एक विवाहित महिला और एक अकेली या अविवाहित महिला के बीच कोई मनमाना वर्गीकरण नहीं करता है। यदि कोई विवाहित महिला अन्य शर्तों को पूरा करती है, तो वह अपने पति की सहमति सहित सभी कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करने की शर्त पर डोनर के वीर्य (सीमेन) का उपयोग करके, व्यक्तिगत रूप से ART सेवाओं का लाभ उठा सकती है।”

    इस पृष्ठभूमि में, याचिकाओं को खारिज कर दिया गया।

    Case Title : Dr. A v Union of India & Ors., and other connected petitions

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