'चौंकाने वाला': राजस्थान हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर नाबालिग रेप पीड़िता के मुआवज़े का दावा खारिज करने पर लगाई कड़ी फटकार

Shahadat

13 April 2026 9:42 AM IST

  • चौंकाने वाला: राजस्थान हाईकोर्ट ने तकनीकी आधार पर नाबालिग रेप पीड़िता के मुआवज़े का दावा खारिज करने पर लगाई कड़ी फटकार

    आश्चर्य और हैरानी जताते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) का आदेश रद्द किया, जिसमें नाबालिग रेप पीड़िता के अंतरिम मुआवज़े का आवेदन खारिज कर दिया गया था, और उससे SHO/मजिस्ट्रेट से ज़रूरी सर्टिफिकेट लाने को कहा गया।

    जस्टिस अनूप कुमार ढांड की बेंच ने माना कि राजस्थान पीड़ित मुआवज़ा योजना 2011 (योजना) का पालन प्रतिवादी द्वारा उसकी मूल भावना और अक्षरशः नहीं किया गया। कोर्ट ने राय दी कि आवेदन खारिज करने के बजाय DLSA को संबंधित अधिकारी से ज़रूरी सर्टिफिकेट भेजने के लिए कहना चाहिए था।

    इसके बाद कोर्ट ने राजस्थान राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (RSLSA) और सभी DLSA को सामान्य निर्देश जारी किया कि वे रेप पीड़ितों के लिए अंतरिम और अंतिम मुआवज़े के रूप में राशि के वितरण के लिए एक समान नीति अपनाएं, बजाय इसके कि वे पीड़ितों से SHO या कोर्ट से सर्टिफिकेट लाने की ज़िद करें।

    आगे कहा गया,

    “ऐसी रेप पीड़ितों के मामलों का विवरण ये प्राधिकरण अपने उचित स्तर पर मंगा सकते हैं, बजाय इसके कि रेप पीड़िता को सर्टिफिकेट पाने के लिए दर-दर भटकने पर मजबूर किया जाए। RSLSA के सदस्य सचिव से यह अपेक्षा की जाती है कि वे राजस्थान राज्य के सभी ज़िलों के सभी DLSA के सभी पूर्णकालिक सचिवों को ज़रूरी निर्देश जारी करें ताकि जारी किए गए निर्देशों का पालन किया जा सके...”

    याचिकाकर्ता 14 साल की रेप पीड़िता है, जिसने ट्रायल के चरण में योजना के तहत अंतरिम मुआवज़े के लिए आवेदन किया था, जिसे DLSA ने एक तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया कि इस संबंध में संबंधित स्टेशन अधिकारी/मजिस्ट्रेट द्वारा कोई सर्टिफिकेट जारी नहीं किया गया। इसलिए कोर्ट में याचिका दायर की गई।

    कोर्ट ने रेप पीड़ितों के लिए मुआवज़े के महत्व पर ज़ोर दिया और बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट के फैसले अल अमीन बनाम राज्य का संदर्भ दिया, जिसमें यह माना गया कि यौन हमले के अपराधियों को केवल सज़ा देना ही काफी नहीं है, बल्कि पीड़ित और उसके परिवार के सदस्यों को हुए नुकसान और क्षति की भरपाई के लिए पर्याप्त आर्थिक मुआवज़ा भी ज़रूरी है। अपराध-पीड़ित विज्ञान का आधुनिक दृष्टिकोण यह स्वीकार करता है कि अपराध के शिकार व्यक्ति को उचित मुआवज़ा, पुनर्वास और क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार है। मानवीय दृष्टिकोण से इस बात से असहमत होने की कोई गुंजाइश नहीं है कि अपराध के शिकार लोगों को—विशेषकर बलात्कार के शिकार लोगों को—'क्षतिपूर्ति' या 'मुआवज़े' के रूप में कुछ ऐसा मिलना ही चाहिए, जो उनके लगातार जारी कष्टों और मानसिक आघात को कम कर सके।

    इस संदर्भ में, सुप्रीम कोर्ट के एक मामले—मोहम्मद हारून और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य—का भी ज़िक्र किया गया। इस मामले में कोर्ट ने यह माना कि यद्यपि मुआवज़े के तौर पर दी जाने वाली कोई भी राशि पूरी तरह से पर्याप्त नहीं हो सकती। फिर भी चूंकि राज्य (सरकार) मौलिक अधिकारों के इतने गंभीर उल्लंघन को रोकने में विफल रहा था, इसलिए यह उसका कर्तव्य बनता है कि वह पीड़ित को ऐसी सहायता प्रदान करे, जो उसके पुनर्वास में सहायक सिद्ध हो।

    इसी पृष्ठभूमि में, कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि DLSA से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह पीड़ित के आवेदन को इतने लापरवाही भरे ढंग से अस्वीकार कर दे। तदनुसार, DLSA द्वारा पारित आदेश रद्द कर दिया गया। DLSA को यह निर्देश दिया गया कि वह संबंधित अधिकारियों से प्रमाण-पत्र प्राप्त करने के बाद—न कि याचिकाकर्ता पर उसे प्राप्त करने का ज़ोर डालकर—याचिकाकर्ता के आवेदन के संबंध में उचित आदेश पारित करे।

    कोर्ट ने RSLSA और विभिन्न DLSAs को आगे यह भी निर्देश दिया कि वे बलात्कार पीड़ितों को मुआवज़ा वितरित करने के लिए समान नीति अपनाएं। इस संबंध में वे पीड़ितों पर संबंधित SHO या न्यायालय से प्रमाण-पत्र प्राप्त करने का ज़ोर न डालें।

    तदनुसार, इस याचिका का निपटारा कर दिया गया।

    Title: S d/o A v State of Rajasthan & Ors.

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