नामर्दी के आरोपों को गलत साबित करने के लिए पत्नी के नार्को, पॉलीग्राफ और DNA टेस्ट की मांग: राजस्थान हाईकोर्ट ने खारिज की पति की अर्ज़ी

Shahadat

19 Jun 2026 9:28 AM IST

  • नामर्दी के आरोपों को गलत साबित करने के लिए पत्नी के नार्को, पॉलीग्राफ और DNA टेस्ट की मांग: राजस्थान हाईकोर्ट ने खारिज की पति की अर्ज़ी

    राजस्थान हाईकोर्ट ने पति की उस अर्ज़ी को खारिज करने का फैसला सही ठहराया, जिसमें उसने अपनी और अपनी पत्नी की संयुक्त मेडिकल जांच की मांग की थी, ताकि पत्नी द्वारा तलाक की अर्ज़ी में लगाए गए शारीरिक अक्षमता और नामर्दी के आरोपों को गलत साबित किया जा सके। [2026 LiveLaw (Raj) 248]

    जस्टिस संजीत पुरोहित की बेंच ने कहा कि पहली बात तो यह कि अर्ज़ी कार्यवाही के बहुत बाद के चरण में दायर की गई। दूसरी बात, याचिकाकर्ता कथित यौन अक्षमता या नामर्दी के मुद्दे के लिए नार्को टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट, DNA टेस्ट आदि की प्रासंगिकता या आवश्यकता को साबित करने में विफल रहा।

    कोर्ट ने आगे कहा कि चूंकि आरोप प्रतिवादी-पत्नी द्वारा लगाए गए, इसलिए सबूत पेश करने की ज़िम्मेदारी उसी की थी। कोर्ट से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह किसी पक्षकार की ओर से सबूत इकट्ठा करे।

    बता दें, याचिकाकर्ता की पत्नी ने क्रूरता, परित्याग और याचिकाकर्ता की यौन अक्षमता और नामर्दी के आधार पर तलाक के लिए अर्ज़ी दायर की। कार्यवाही के दौरान, याचिकाकर्ता ने अपनी और अपनी पत्नी की संयुक्त नार्को-एनालिसिस टेस्ट, पॉलीग्राफ टेस्ट, मेडिकल जांच और DNA टेस्टिंग की मांग करते हुए एक अर्ज़ी दायर की।

    ट्रायल कोर्ट ने इस अर्ज़ी को खारिज कर दिया था। याचिकाकर्ता ने मौजूदा याचिका में ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी।

    यह तर्क दिया गया कि अर्ज़ी अतिरिक्त सबूत रिकॉर्ड पर लाने के लिए दायर की गई, क्योंकि यौन अक्षमता के आरोपों को केवल इन टेस्ट को करके ही प्रभावी ढंग से गलत साबित किया जा सकता है।

    इसके विपरीत, प्रतिवादी ने कहा कि अर्ज़ी बहुत देर से दायर की गई, जब दोनों पक्षों के सबूत पूरे हो चुके थे। यह कहा गया कि याचिकाकर्ता ने ट्रायल के दौरान अपनी यौन अक्षमता और नामर्दी के आरोपों को गलत साबित करने के लिए कोई दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं किया।

    इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि पत्नी को उसकी मर्ज़ी के खिलाफ इन टेस्ट से गुज़रने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

    तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अपने खुद के सबूत पेश करने के दौरान, याचिकाकर्ता ने ऐसे आरोपों को चुनौती देने के लिए कोई मेडिकल सबूत रिकॉर्ड पर लाने का प्रयास नहीं किया।

    सुप्रीम कोर्ट के के.के. वेलुसामी बनाम एन. पलानीसामी मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह तय किया गया,

    "अगर मामले की परिस्थितियां यह दिखाती हैं कि किसी पक्ष के पास सही समय पर सबूत पेश करने का पर्याप्त मौका था, लेकिन वह ऐसा करने में नाकाम रहा तो सबूतों को फिर से पेश करने या गवाहों को दोबारा बुलाने की अर्जी को खारिज कर दिया जाना चाहिए, अगर ऐसा लगता है कि यह अर्जी बिना वजह देरी करने के गलत मकसद से दायर की गई।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपों का खंडन करने के लिए इन टेस्ट की ज़रूरत के बारे में सिर्फ़ बिना ठोस आधार के दावे करने के अलावा, याचिकाकर्ता ने ऐसी प्रासंगिकता या ज़रूरत के बारे में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया।

    कोर्ट प्रतिवादी की इस दलील से भी सहमत था कि पत्नी को उसकी सहमति के बिना ऐसे टेस्ट करवाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।

    इस पृष्ठभूमि में, कोर्ट ने कहा कि हालांकि उसके पास अतिरिक्त सबूतों की अनुमति देने या किसी गवाह को दोबारा बुलाने की अंतर्निहित शक्ति है, लेकिन ऐसी शक्ति असाधारण थी और इसे सामान्य तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर अर्जी नेक नीयत से नहीं थी। इसका मकसद केवल कार्यवाही में देरी करना था, जो कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग था।

    इसके अनुसार, याचिकाकर्ता की याचिका खारिज की गई।

    Title: B v N

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