राजस्थान हाईकोर्ट ने मंत्री की ऑनलाइन आलोचना करने पर टीचर का सस्पेंशन रद्द किया, कहा - 'कार्यकारी नाराज़गी' कानून से ऊपर नहीं हो सकती

Shahadat

20 May 2026 9:47 AM IST

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने मंत्री की ऑनलाइन आलोचना करने पर टीचर का सस्पेंशन रद्द किया, कहा - कार्यकारी नाराज़गी कानून से ऊपर नहीं हो सकती

    राजस्थान हाईकोर्ट ने एक सरकारी टीचर का सस्पेंशन रद्द किया। टीचर को सोशल मीडिया पर एक मौजूदा मंत्री के खिलाफ टिप्पणी करने के आरोप में सस्पेंड किया गया।

    जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने फैसला सुनाया कि सस्पेंशन के आदेश में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं था कि किस कानूनी अधिकार के तहत याचिकाकर्ता को सस्पेंड किया गया। कोर्ट ने कहा कि कार्यकारी नाराज़गी या किसी को हुई कथित शर्मिंदगी, कानूनी अधिकार की जगह नहीं ले सकती।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि ज़्यादा से ज़्यादा इन आरोपों के आधार पर कानून के मुताबिक सिर्फ़ विभागीय जांच शुरू की जा सकती थी।

    "सिर्फ़ इसलिए कि आरोप लगाए गए कि किसी मंत्री की छवि खराब करने की कोशिश की गई, प्रशासनिक अधिकारियों को यह असीमित अधिकार नहीं मिल जाता कि वे अपनी मर्ज़ी से किसी को भी सस्पेंड कर दें। एक ऐसे संवैधानिक ढांचे में जो कानूनी अनुशासन से चलता है, अधिकारी खुद को वे अधिकार नहीं दे सकते, जो उन्हें कानून ने नहीं दिए हैं... प्रशासनिक सुविधा या अपनी सोच, अनिवार्य कानूनी ज़रूरतों की जगह नहीं ले सकती।"

    बता दें, याचिकाकर्ता एक सरकारी टीचर के तौर पर काम कर रहा था, जब ज़िला शिक्षा अधिकारी के आदेश पर उसे सस्पेंड कर दिया गया।

    उसी दिन, उसे एक आरोप-पत्र (चार्जशीट) भी दिया गया, जिसमें उसके कथित दुर्व्यवहार का ज़िक्र था। इसमें बताया गया कि सोशल मीडिया पर उसकी कुछ टिप्पणियाँ अशोभनीय थीं, जिनसे विभाग और मंत्री की छवि खराब हुई।

    सस्पेंशन के इस आदेश को कोर्ट में इस आधार पर चुनौती दी गई कि आदेश में किसी भी ऐसे कानूनी प्रावधान का ज़िक्र नहीं था, जिसके तहत यह कार्रवाई की गई हो।

    इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि राजस्थान सिविल सर्विसेज़ (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 ("नियम") के नियम 13 के तहत, सस्पेंशन का आदेश केवल सक्षम अधिकारी ही जारी कर सकता है। हालांकि, यह आदेश ज़िला शिक्षा अधिकारी ने जारी किया था, जो याचिकाकर्ता की नियुक्ति करने वाला अधिकारी नहीं था।

    याचिकाकर्ता के वकील ने आगे तर्क दिया कि किसी को सिर्फ़ इसलिए सस्पेंड नहीं किया जा सकता कि उस पर कुछ आरोप लगे हैं; सस्पेंशन की कार्रवाई तभी की जा सकती है, जब वह पूरी तरह से किसी कानूनी प्रावधान के तहत आती हो।

    सभी तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए तर्कों से सहमति जताई। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सस्पेंशन के आदेश में इस बात का कोई ज़िक्र नहीं था कि यह आदेश किस कानूनी अधिकार के तहत जारी किया गया; न ही इसमें नियम 13 या किसी अन्य संबंधित प्रावधान का कोई हवाला दिया गया। अदालत ने फैसला दिया कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में, हर प्रशासनिक कार्रवाई जिसका कोई नागरिक परिणाम होता है, उसकी वैधता किसी कानूनी प्रावधान से ही मिलनी चाहिए।

    आगे कहा गया,

    “ज़िला शिक्षा अधिकारी बेशक एक कानूनी पदधारी है, लेकिन निश्चित रूप से किसी राजवंश का शासक नहीं है, जिसे अपनी निजी पसंद या प्रशासनिक मनमानी के हिसाब से शासन करने का अधिकार हो। उसका अधिकार पूरी तरह से कानून से ही मिलता है और उसे कानूनी सीमाओं के भीतर ही रहना चाहिए। इससे किसी भी तरह का भटकाव, सत्ता का गलत इस्तेमाल और प्रशासनिक मनमानी माना जाएगा।”

    यह कहा गया कि निलंबन कोई असीमित कार्यकारी विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि एक गंभीर कदम है, जिसका इस्तेमाल सख्ती से कानून की सीमाओं के भीतर ही किया जा सकता है। अगर किसी कार्रवाई का कोई कानूनी आधार नहीं है, तो वह कानून की नज़र में मान्य नहीं है।

    इस पृष्ठभूमि में अदालत ने फैसला दिया कि निलंबन का आदेश अधिकार क्षेत्र की स्पष्ट कमी से ग्रस्त था और मान्य नहीं था।

    तदनुसार, याचिका स्वीकार की गई और निलंबन का आदेश रद्द कर दिया गया। याचिकाकर्ता को बहाल करने का आदेश दिया गया।

    Title: Lal Singh Chouhan v State of Rajasthan & Ors.

    Next Story