POCSO Case: राजस्थान हाईकोर्ट ने पीड़िता की उम्र से जुड़े दस्तावेज़ मंगाने की आरोपी की अर्ज़ी को आंशिक रूप से दी मंज़ूरी

Shahadat

6 Jun 2026 9:12 PM IST

  • POCSO Case: राजस्थान हाईकोर्ट ने पीड़िता की उम्र से जुड़े दस्तावेज़ मंगाने की आरोपी की अर्ज़ी को आंशिक रूप से दी मंज़ूरी

    राजस्थान हाईकोर्ट ने POCSO मामले के आरोपी की उस अर्ज़ी को आंशिक रूप से मंज़ूरी दी, जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसकी CrPC की धारा 91 की अर्ज़ी खारिज की गई थती। इस अर्ज़ी में पीड़िता की उम्र तय करने के लिए कम्युनिटी हेल्थ सेंटर द्वारा जारी उसके एडमिशन टिकट को पेश करने की मांग की गई।

    ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए अर्ज़ी खारिज की थी कि आरोपी द्वारा पीड़िता की उम्र के संबंध में जिरह (Cross-Examination) पहले ही पूरी की जा चुकी है।

    CrPC की धारा 91 (दस्तावेज़ या अन्य चीज़ पेश करने के लिए समन) अदालतों और पुलिस अधिकारियों को किसी भी ऐसे दस्तावेज़ या वस्तु को पेश करने के लिए समन जारी करने का अधिकार देती है, जिसे CrPC के तहत किसी जांच, पूछताछ, ट्रायल या अन्य कार्यवाही के लिए ज़रूरी माना जाता है।

    जस्टिस अनूप कुमार ढांड की बेंच ने कहा कि किसी आरोपी को निष्पक्ष ट्रायल के अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।

    इसमें कहा गया:

    "यह बात विवादित नहीं है कि जब 29.02.2021 को ट्रायल कोर्ट के सामने पीड़िता के बयान दर्ज किए गए, तब याचिकाकर्ता को यह जानकारी नहीं थी कि पीड़िता ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, फागी, जिला जयपुर में एक बच्चे को जन्म दिया, जहां उसने अपनी उम्र उन्नीस साल बताई। यह बात उसे बाद में पता चली। इसके बाद उसने सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, फागी से पीड़िता के बच्चे के जन्म के बारे में जानकारी पाने के लिए आवेदन दिया और 17.01.2023 को प्राथमिक स्वास्थ्य अधिकारी, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, फागी ने याचिकाकर्ता को यह जानकारी उपलब्ध कराई।

    इसके तुरंत बाद याचिकाकर्ता ने CrPC की धारा 91 के तहत सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, फागी, जयपुर से पीड़िता का एडमिशन टिकट मंगाने के लिए आवेदन दिया। इस कोर्ट की राय में याचिकाकर्ता ने उक्त आवेदन दाखिल करने में कोई देरी नहीं की है। ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को मेरिट के आधार पर नहीं, बल्कि इस तकनीकी आधार पर खारिज किया कि पीड़िता के बयान पहले ही दर्ज किए जा चुके थे और पीड़िता की उम्र के बारे में बहस के संबंध में क्रॉस-एग्जामिनेशन के लिए याचिकाकर्ता को पर्याप्त समय दिया गया।"

    बता दें, याचिकाकर्ता POCSO के तहत आरोपी था और उसका आरोप था कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 18 साल से अधिक थी।

    पीड़िता ने एक सामुदायिक केंद्र में बच्चे को जन्म दिया। जब याचिकाकर्ता को इस जानकारी के बारे में पता चला तो उसने सामुदायिक केंद्र द्वारा जारी पीड़िता के एडमिशन टिकट के बारे में जानकारी पाने के लिए RTI दाखिल की।

    कथित तौर पर, इससे पता चला कि उस समय पीड़िता की उम्र 18 साल से अधिक थी। इसके तुरंत बाद याचिकाकर्ता ने CrPC की धारा 91 के तहत एक आवेदन दाखिल किया।

    तर्क सुनने के बाद कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़िता द्वारा सामुदायिक केंद्र में बच्चे को जन्म देने की बात याचिकाकर्ता को पहले पता नहीं थी। जैसे ही उसे यह जानकारी मिली, RTI दाखिल की गई और उसके बाद CrPC की धारा 91 के तहत आवेदन दिया गया। इस बात को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने माना कि एप्लीकेशन दाखिल करने में कोई देरी नहीं हुई थी।

    आगे कहा गया,

    "कानून का यह स्थापित नियम है कि किसी आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई के मौके से वंचित नहीं किया जा सकता। अगर ट्रायल खत्म होने से पहले, किसी भी बाद के चरण में आरोपी या कोर्ट के ध्यान में कोई ऐसी बात आती है, जो मामले के सही फैसले के लिए ज़रूरी है तो आरोपी को वह दस्तावेज़ पेश करने का मौका दिया जाना चाहिए जो मामले के सही फैसले के लिए अहम हो सकता है।"

    अगर किसी ऐसे रिकॉर्ड को पेश नहीं किया जाता, जो क्रिमिनल ट्रायल में 'इंडियन एविडेंस एक्ट' के तहत मान्य है। इस वजह से आरोपी को अपनी बात रखने का सही मौका नहीं मिलता तो यह न्याय में बाधा डालने जैसा होगा। CrPC की धारा 91 मामले के निष्पक्ष और सही समाधान में मदद करती है। यह पक्का करती है कि कोर्ट को सही फ़ैसले लेने और न्यायपूर्ण नतीजे तक पहुँचने के लिए ज़रूरी सबूत मिलें। यह कोर्ट को ऐसे ज़रूरी दस्तावेज़ी सबूत हासिल करने में मदद करती है, जो किसी व्यक्ति या संस्था के पास हो सकते हैं। साथ ही यह अहम दस्तावेज़ों को नष्ट होने, उनमें छेड़छाड़ होने या उनके खोने से बचाती है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनी रहती है।

    कोर्ट ने कहा,

    "CrPC की धारा 91 के तहत मिली शक्ति का इस्तेमाल ऐसे सबूत पेश करने के लिए किया जाना चाहिए, जो न्याय पाने की कोशिश में सच का पता लगाने में कोर्ट की मदद करें।"

    हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी के कहने भर से पुलिस अधिकारियों की निजता (प्राइवेसी) के अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। कॉल डिटेल्स या टावर लोकेशन पेश करने का कोई भी आदेश जारी करने से पहले, "आरोपी को ऐसे सबूत की ज़रूरत और अहमियत साबित करनी होगी, जो उसके दोषी या निर्दोष होने को साबित करने के लिए ज़रूरी हों।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "चूंकि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अहम हिस्सा हैं, इसलिए सबसे अच्छे उपलब्ध सबूत को न मानना ​​या आरोपी को अपना बचाव साबित करने के लिए असरदार और ठोस सुनवाई का मौका न देना, निष्पक्ष सुनवाई से इनकार करने जैसा होगा।"

    याचिका आंशिक रूप से मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह कम्युनिटी हेल्थ सेंटर से एडमिशन टिकट मंगवाए और याचिकाकर्ता को उस एडमिशन टिकट के आधार पर शिकायतकर्ता (महिला) से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) करने का आखिरी मौका दे।

    Title: Ranjeet Raigar v State of Rajasthan & Anr.

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