राजस्थान हाईकोर्ट ने रिटायर जज के किडनी ट्रांसप्लांट खर्च की भरपाई के दावे पर फिर से विचार करने का आदेश दिया

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने रिटायर जज के किडनी ट्रांसप्लांट खर्च की भरपाई के दावे पर फिर से विचार करने का आदेश दिया

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कानून एवं विधि कार्य विभाग (Law and Legal Affairs Department) का वह आदेश रद्द किया, जिसमें रिटायर न्यायिक अधिकारी के किडनी ट्रांसप्लांट के खर्च की भरपाई के दावे को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि विभाग के सचिव को राज्य प्राधिकरण समिति (State Authorisation Committee) द्वारा दी गई अनुमति (ऑथराइजेशन) की वैधता पर सवाल उठाने का अधिकार नहीं है।

    जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण और जस्टिस बिपिन गुप्ता की खंडपीठ ने कहा कि 'मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994' (Transplantation of Human Organs and Tissues Act, 1994) के तहत सचिव कोई अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) नहीं हैं, और वे राज्य प्राधिकरण समितियों द्वारा दी गई अनुमति की वैधता की जांच नहीं कर सकते।

    कोर्ट, दिवंगत रिटायर न्यायिक अधिकारी चंद्र नारायण माथुर के कानूनी प्रतिनिधियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इस याचिका में किडनी ट्रांसप्लांट के मेडिकल खर्च की भरपाई के दावे को खारिज किए जाने को चुनौती दी गई।

    बता दें, दिवंगत याचिकाकर्ता ने राजस्थान (जहां वे रहते थे) और पश्चिम बंगाल (जहां डोनर रहते थे और जहां ट्रांसप्लांट हुआ था) की राज्य प्राधिकरण समितियों से अनुमति प्राप्त की थी।

    सर्जरी के बाद याचिकाकर्ता ने हुए खर्च की भरपाई की मांग की। इसके बाद, 'मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994' के नियमों का पालन हुआ है या नहीं, इसकी जांच के लिए मामला कानून एवं विधि कार्य विभाग को भेजा गया। विभाग ने इस आधार पर दावा खारिज कर दिया कि अधिनियम की धारा 9(5) के अनुसार, डोनर और प्राप्तकर्ता (Recipient) को अनुमति के लिए संयुक्त रूप से आवेदन करना होता है, और यह शर्त पूरी नहीं की गई।

    रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों और दोनों राज्यों द्वारा जारी की गई अनुमतियों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने टिप्पणी की:

    "कानून एवं विधि कार्य विभाग के सचिव के पास ऐसा कोई दस्तावेज या जानकारी नहीं है, जिससे यह कहा जा सके कि राजस्थान या पश्चिम बंगाल की राज्य प्राधिकरण समिति के समक्ष संयुक्त रूप से आवेदन नहीं किया गया। इसके अलावा, वे कोई अपीलीय प्राधिकरण नहीं हैं, जो दो अलग-अलग राज्यों की राज्य प्राधिकरण समितियों द्वारा दी गई अनुमति की वैधता की समीक्षा कर सकें।"

    कोर्ट ने माना कि विभाग का आदेश उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है और इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता। इसके अनुसार, अदालत ने प्रतिपूर्ति (रीइंबर्समेंट) दावे को खारिज करने वाले आदेश और उससे जुड़े सभी आदेशों को रद्द किया। साथ ही प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे दिवंगत याचिकाकर्ता के दावे की जांच करें और एक महीने के भीतर राशि का भुगतान करें।

    अदालत ने विधि एवं कानूनी मामलों के विभाग को यह भी निर्देश दिया कि वह दिवंगत याचिकाकर्ता के कानूनी प्रतिनिधियों को खर्च के तौर पर 50,000 रुपये का भुगतान करे। इसके अलावा, यह निर्देश दिया गया कि प्रतिपूर्ति की राशि का भुगतान, दावा करने की तारीख से लेकर भुगतान की तारीख तक, 12% वार्षिक ब्याज के साथ किया जाए।

    Case Title : LRs. Of Late Shri Chandra Narayan Mathur v the State of Rajasthan & Ors

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