पति-पत्नी की एक ही स्थान पर पोस्टिंग का पूर्ण अधिकार नहीं, परिवार की जिम्मेदारी सिर्फ एक जीवनसाथी पर नहीं डाल सकते: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
21 Oct 2026 12:34 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की उन याचिकाओं में हस्तक्षेप करने से इनकार किया, जिनमें उन्होंने अपने जीवनसाथी की पोस्टिंग वाले स्थान पर तबादले की मांग की थी।
जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने कहा कि पति-पत्नी की एक ही स्थान पर पोस्टिंग को लेकर सामान्य नीति का होना और इच्छित स्थान पर रिक्त पद उपलब्ध होना, अपने आप में कर्मचारी को वहां तबादले का कानूनी रूप से लागू कराया जा सकने वाला अधिकार नहीं देता।
हाईकोर्ट ने कहा कि तबादले के फैसले में पद की प्रकृति, संबंधित कैडर और सेवा नियमों, मौजूदा तथा प्रस्तावित पोस्टिंग वाले स्थानों पर कर्मचारियों की जरूरत, कार्यकाल, कर्मचारी की उपयुक्तता और प्रशासन की अन्य आवश्यकताओं जैसे पहलुओं पर विचार करना जरूरी है। जेल और पुलिस जैसे विभागों में कार्यबल की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना और प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार कर्मचारियों की तैनाती करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसलिए ऐसी नीति को इन परिस्थितियों पर विचार किए बिना यांत्रिक तरीके से लागू नहीं किया जा सकता।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि समय के साथ सामाजिक परिस्थितियां बदली हैं और कार्यक्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। ऐसे में पति-पत्नी की एक ही स्थान पर पोस्टिंग की वांछनीयता का आकलन इस धारणा के आधार पर नहीं किया जा सकता कि परिवार की जिम्मेदारियां मुख्य रूप से एक ही जीवनसाथी निभाता है।
कोर्ट के समक्ष सरकारी कर्मचारियों की कई याचिकाएं थीं। याचिकाकर्ताओं ने अपने जीवनसाथी की पोस्टिंग वाले स्थान पर तैनाती की मांग करते हुए सामान्य नीति का हवाला दिया, जिसमें पति-पत्नी को एक ही स्थान पर पोस्ट करने की वांछनीयता को मान्यता दी गई। प्रशासनिक सुधार विभाग की ओर से 18 मई 2020 को जारी सर्कुलर में भी इस पहलू का उल्लेख किया गया।
दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने नीति और सर्कुलर के अस्तित्व को स्वीकार किया, लेकिन स्पष्ट किया कि सर्कुलर को कर्मचारियों को अपनी पसंद के स्थान पर तबादला पाने का पूर्ण अधिकार देने वाला नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के बैंक ऑफ इंडिया बनाम जगजीत सिंह मेहता मामले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि विभागीय अधिकारियों को प्रशासनिक जरूरतों और अन्य कर्मचारियों के दावों को ध्यान में रखते हुए उपयुक्त पोस्टिंग की संभावना पर विचार करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस विषय में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। संवैधानिक मूल्यों और परिवार से जुड़ी वास्तविक जरूरतों को प्रशासनिक निर्णयों में महत्व मिलना चाहिए, लेकिन इन पहलुओं को ध्यान में रखने का तरीका लागू सेवा शर्तों और वैध प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप होना चाहिए।
पीठ ने आगे कहा कि आज दोनों जीवनसाथियों की अपनी स्वतंत्र सेवा संबंधी बाध्यताएं, पेशेवर जिम्मेदारियां और करियर से जुड़ी प्राथमिकताएं होती हैं। इसलिए यह मानकर नहीं चला जा सकता कि एक जीवनसाथी की पोस्टिंग को समायोजित करने के लिए दूसरे के करियर को हमेशा प्राथमिकता छोड़नी पड़ेगी। निष्पक्ष और समकालीन दृष्टिकोण यही है कि दोनों कर्मचारियों की परिस्थितियों पर विचार किया जाए और यह पूर्वधारणा न बनाई जाए कि किसी एक का तबादला दूसरे की सुविधा के लिए स्वतः बदल दिया जाना चाहिए। साथ ही, प्रशासन को विभिन्न संस्थानों में पर्याप्त स्टाफ बनाए रखने और सार्वजनिक सेवाओं का सुचारु संचालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी नीति का पुराना होना अपने आप में उसे अवैध नहीं बनाता। हालांकि, उसका क्रियान्वयन वर्तमान प्रशासनिक जरूरतों और लागू सेवा नियमों के अनुरूप होना चाहिए। यदि मौजूदा नीति में बदलाव की आवश्यकता है तो यह सक्षम कार्यपालिका का विषय है और अदालत नीति को अपनी ओर से दोबारा नहीं लिख सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक हस्तक्षेप तभी उचित होगा, जब संबंधित प्रशासनिक निर्णय मनमाना, भेदभावपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण साबित हो, किसी बाध्यकारी वैधानिक प्रावधान के विपरीत हो या किसी अन्य कानूनी आधार पर टिकाऊ न हो। ऐसी परिस्थितियां मौजूद नहीं होने पर अदालत सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी के निर्णय की जगह अपनी पसंद का पोस्टिंग संबंधी फैसला नहीं थोप सकती।
मामले में कोर्ट को ऐसी कोई परिस्थिति नहीं मिली, जिसके आधार पर संबंधित अधिकारियों को सामान्य निर्देश देकर याचिकाकर्ताओं को उनके जीवनसाथी की पोस्टिंग वाले स्थान पर तैनात करने के लिए बाध्य किया जा सके। इसलिए हाईकोर्ट ने सभी याचिकाओं का निपटारा करते हुए याचिकाकर्ताओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष नए सिरे से अभ्यावेदन देने की छूट प्रदान की।

