विवाह संबंध कायम होने की बात अभियोजन सामग्री में हो तो धारा 376 प्रथम दृष्टया लागू नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
19 Aug 2026 1:13 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने दुष्कर्म के आरोप में आरोपी बनाए गए एक व्यक्ति को राहत देते हुए उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत लगाए गए आरोप रद्द किया।
जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने कहा कि अभियोजन की अपनी सामग्री से यह सामने आ रहा है कि संबंधित अवधि में आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच पति-पत्नी का संबंध कायम था। ऐसे में प्रथम दृष्टया धारा 376 के तहत दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता।
अदालत ने यह फैसला आरोपी की ओर से आरोप तय किए जाने को चुनौती देते हुए दायर आपराधिक पुनर्विचार याचिका पर सुनाया। हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दुष्कर्म का आरोप रद्द किया।
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता ने तलाक के बाद दोबारा विवाह के लिए एक विज्ञापन दिया था। इसी के आधार पर उसकी मुलाकात आरोपी से हुई। दोनों के विवाह के लिए एक तारीख तय हुई और वे मंदिर पहुंचे। शिकायतकर्ता के अनुसार वहां आरोपी ने पारिवारिक विवाद का हवाला देते हुए कहा कि विवाह की व्यवस्था नहीं हो सकी है।
इसके बाद दोनों ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई और मंगलसूत्र का आदान-प्रदान किया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि आरोपी ने बाद में विधि के अनुसार विवाह कराने और उसका पंजीकरण कराने का भरोसा दिया।
शिकायतकर्ता के अनुसार इसके बाद आरोपी और सह-आरोपी उसे अपने साथ ले गए। जब उसने विवाह विधिवत संपन्न होने से पहले शारीरिक संबंध बनाने से इनकार किया तो आरोपी ने जबरन उसके साथ संबंध बनाए। आरोप था कि उसे बंधक बनाकर रखा गया और बार-बार यौन हिंसा की गई। बाद में उसके गर्भवती होने पर उसे उसके मायके छोड़ दिया गया।
शिकायतकर्ता ने एक बेटे को जन्म दिया और बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में आरोपी का नाम पिता के रूप में दर्ज था। इन आरोपों के आधार पर आरोपी के खिलाफ FIR दर्ज की गई। मामले में दुष्कर्म के अलावा जानलेवा बीमारी फैलाने का आरोप भी लगाया गया, क्योंकि आरोपी के एचआईवी संक्रमित होने की बात सामने आई।
आरोपी ने अपने खिलाफ लगाए गए आरोपों को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता का लगातार यह रुख रहा कि आरोपी ने वरमाला और मंगलसूत्र का आदान-प्रदान करके उससे विवाह किया। बाद में उसने यह आरोप लगाया कि विवाह आवश्यक कानूनी औपचारिकताओं के अनुसार संपन्न और पंजीकृत नहीं हुआ था क्योंकि आरोपी ने बाद में ऐसा करने का भरोसा दिया।
अदालत ने बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र में आरोपी का नाम पिता के रूप में दर्ज होने के तथ्य को भी महत्वपूर्ण माना। अभियोजन की सामग्री पर गौर करते हुए कोर्ट ने कहा कि कथित यौन संबंध उस अवधि में बने, जब दोनों के बीच पति-पत्नी का संबंध होने की बात कही और मानी जा रही थी।
हाईकोर्ट ने कहा,
“अभियोजन की पूरी कहानी इसी आधार पर आगे बढ़ती है कि याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता से विवाह किया। संबंधित समय में वह उसके लिए कोई अजनबी नहीं था बल्कि दोनों के बीच पति-पत्नी का संबंध होने का दावा स्वयं अभियोजन की कहानी का हिस्सा है।”
अदालत ने माना कि मामले की परिस्थितियों में संबंधित समय पर दोनों के बीच वैवाहिक संबंध कायम होने की बात अभियोजन सामग्री से ही सामने आती है। इसलिए आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म का अपराध प्रथम दृष्टया आकर्षित नहीं होता।
इसके आधार पर हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनर्विचार याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आरोपी के खिलाफ धारा 376 के तहत लगाया गया आरोप रद्द किया।


