जुए के मामले में 100 रुपये का जुर्माना 'नैतिक अधमता' नहीं, नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

22 Jun 2026 12:20 PM IST

  • जुए के मामले में 100 रुपये का जुर्माना नैतिक अधमता नहीं, नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि राजस्थान सार्वजनिक जुआ अध्यादेश के तहत किसी व्यक्ति पर केवल जुर्माना लगाए जाने को 'नैतिक अधमता' (मोरल टरपिट्यूड) नहीं माना जा सकता। ऐसे आधार पर किसी पात्र अभ्यर्थी को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस कुलदीप माथुर की पीठ ने कहा कि यदि किसी अभ्यर्थी को किसी मामले में दोषी ठहराया गया हो तो केवल उसी आधार पर यांत्रिक तरीके से नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। नियुक्ति प्राधिकारी का दायित्व है कि वह यह जांच करे कि संबंधित अपराध नैतिक अधमता या हिंसा से जुड़ा है या नहीं।

    मामला एक अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा था। याचिकाकर्ता के पिता संबंधित विभाग में कार्यरत थे और सेवा के दौरान उनका निधन हो गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, जिसे स्वीकृति भी मिल गई। हालांकि, माध्यमिक शिक्षा निदेशक के आदेश के आधार पर उसकी नियुक्ति रद्द की गई, क्योंकि वह पूर्व में राजस्थान सार्वजनिक जुआ अध्यादेश के तहत दोषी ठहराया गया और उस पर 100 रुपये का जुर्माना लगाया गया।

    याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि कार्मिक विभाग के 4 दिसंबर 2019 के परिपत्र के अनुसार केवल उन्हीं मामलों में सरकारी नियुक्ति से इनकार किया जा सकता है, जहां अभ्यर्थी नैतिक अधमता या हिंसा से जुड़े अपराध में दोषी ठहराया गया हो।

    यह भी कहा गया कि इतने मामूली अपराध के आधार पर नियुक्ति से वंचित करना न केवल याचिकाकर्ता के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि उसके सुधार की संभावना को भी समाप्त कर देगा और उसे जीवनभर अपराधी का ठप्पा झेलना पड़ेगा।

    सुनवाई के दौरान अदालत ने पूर्व के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें यह स्पष्ट किया गया कि राजस्थान सार्वजनिक जुआ अध्यादेश के तहत दोष स्वीकार कर जुर्माना भरने मात्र से नैतिक अधमता का अपराध सिद्ध नहीं होता और इस आधार पर नियुक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने कहा,

    "जहां किसी अभ्यर्थी को दोषी ठहराया गया हो, वहां नियुक्ति से इनकार का निर्णय यांत्रिक ढंग से नहीं लिया जा सकता। जब तक अपराध नैतिक अधमता या हिंसा से संबंधित न हो, नियुक्ति प्रदान की जा सकती है।"

    अदालत ने माना कि केवल इस आधार पर एक पात्र अभ्यर्थी को सरकारी सेवा से वंचित करना कानूनन उचित नहीं है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को याचिकाकर्ता को सेवा में शामिल होने की अनुमति देने का निर्देश दिया।

    Next Story