फर्जी दावों को रोकने के लिए दिव्यांगता प्रमाणपत्र का पुनर्मूल्यांकन कर सकती है सरकार: राजस्थान हाईकोर्ट
Praveen Mishra
12 March 2026 4:22 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने उन याचिकाओं के समूह को खारिज कर दिया, जिनमें राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत पिछले पाँच वर्ष या उससे अधिक समय से दिव्यांग (PwD) कोटे में नियुक्त कर्मचारियों की 'बेंचमार्क डिसेबिलिटी' का अनिवार्य पुनर्मूल्यांकन (reassessment) कराने का निर्देश दिया गया था।
जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकल पीठ ने कहा कि राज्य का यह कर्तव्य है कि वह आरक्षण नीतियों को कानूनी और पारदर्शी तरीके से लागू करे, ताकि समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके। अदालत ने कहा कि व्यवस्था समावेशी है, लेकिन समावेशिता तभी संभव है जब नीतियों को सही तरीके से लागू किया जाए और धोखाधड़ी या फर्जी दावों को हर हाल में रोका जाए।
यह मामला 28 अगस्त 2025 को राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग द्वारा जारी प्रशासनिक आदेश से जुड़ा था। यह आदेश उन अनियमितताओं के सामने आने के बाद जारी किया गया था, जो दिव्यांग कोटे में नियुक्त कर्मचारियों की विकलांगता के आकलन के दौरान सामने आई थीं।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि दिव्यांगता प्रमाणपत्र RPWD अधिनियम, 2016 के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार जारी किया गया था, इसलिए राज्य सरकार को उस पर संदेह करने या दोबारा जांच कराने का अधिकार नहीं है।
उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राज्य का यह कदम मनमाना है और इससे उनके संवैधानिक अधिकार—अनुच्छेद 14, 16 और 21—का उल्लंघन होता है। साथ ही उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई 'रिज़नेबल अकॉमोडेशन' (reasonable accommodation) के सिद्धांत के खिलाफ है।
अदालत का निर्णय
सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को पुनर्मूल्यांकन का आदेश देने का अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि RPWD अधिनियम, 2016 में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो यह कहता हो कि एक बार जारी हुआ प्रमाणपत्र हर स्थिति में अंतिम और बाध्यकारी होगा।
कोर्ट ने यह भी बताया कि इस अधिनियम में उन लोगों के लिए दंड का प्रावधान है जो फर्जी या गलत प्रमाणपत्र के आधार पर लाभ लेते हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि कानून बनाने वालों को ऐसी संभावना का पहले से अंदेशा था।
अदालत ने कहा कि जब बड़ी संख्या में नियुक्तियां होती हैं, तो यह अलग-अलग पता लगाना मुश्किल होता है कि किसने धोखाधड़ी की है, इसलिए सभी नियुक्त कर्मचारियों के लिए सामान्य आदेश लागू किया जा सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि चूंकि सरकारी पद और सार्वजनिक धन जुड़े हुए हैं, इसलिए सरकार का यह दायित्व है कि वह धोखाधड़ी और गलत दावों को रोके और यह सुनिश्चित करे कि आरक्षण का लाभ वास्तव में पात्र दिव्यांग व्यक्तियों को ही मिले।
अदालत की टिप्पणी
अदालत ने कहा कि यदि हर सरकार बदलने पर कर्मचारियों को बार-बार पुनर्मूल्यांकन के लिए मजबूर किया जाए, तब कर्मचारी इस कार्रवाई को चुनौती दे सकते हैं। लेकिन वर्तमान मामले में राज्य सरकार का निर्णय किसी भी कानूनी प्रावधान या मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता।
इसी आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के आदेश को वैध ठहराते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दीं।

