महिला की आधी रात में गिरफ्तारी कानून के खिलाफ, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर NDPS मामला रद्द नहीं होगा: राजस्थान हाईकोर्ट

Amir Ahmad

19 Aug 2026 12:20 PM IST

  • महिला की आधी रात में गिरफ्तारी कानून के खिलाफ, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर NDPS मामला रद्द नहीं होगा: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार करने के लिए विशेष परिस्थितियों में संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति जरूरी है। ऐसी अनुमति के बिना आधी रात में महिला की गिरफ्तारी कानून का उल्लंघन है।

    हालांकि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में हुई इस गंभीर कानूनी चूक के आधार पर अकेले NDPS मामले की FIR और आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।

    जस्टिस अशोक कुमार जैन की पीठ ने एक महिला की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। महिला के खिलाफ मादक पदार्थ से संबंधित अपराध में स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम की धारा 8/20 के तहत FIR दर्ज की गई।

    मामले के अनुसार पुलिस ने संबंधित दिन सूर्यास्त के बाद महिला और सह-आरोपी के घर की तलाशी ली। इसके बाद महिला को रात करीब 1:15 बजे गिरफ्तार किया गया।

    महिला की ओर से दलील दी गई कि सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले महिला की गिरफ्तारी के लिए कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया इसलिए गिरफ्तारी अवैध है।

    पुलिस की ओर से तर्क दिया गया कि तलाशी और गिरफ्तारी महिला पुलिस अधिकारी की मौजूदगी में की गई। हालांकि, हाईकोर्ट ने दलील को पर्याप्त नहीं माना और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 43(5) के प्रावधानों पर गौर किया।

    कोर्ट ने कहा कि इस प्रावधान के तहत सामान्य परिस्थितियों में किसी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यदि असाधारण परिस्थितियों में ऐसी गिरफ्तारी जरूरी हो तो महिला पुलिस अधिकारी को लिखित रिपोर्ट तैयार करनी होगी और संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति लेनी होगी।

    हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में ऐसी कोई पूर्व अनुमति नहीं ली गई। इसलिए महिला की आधी रात में की गई गिरफ्तारी को कानून के विपरीत और अवैध माना गया।

    कोर्ट ने इस मामले में दीपा बनाम एस. विजयलक्ष्मी के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 46(4), जो वर्तमान में BNSS की धारा 43(5) के समान प्रावधान है, को अनिवार्य माना गया।

    हालांकि गिरफ्तारी में हुई इस गलती को हाईकोर्ट ने FIR रद्द करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राज्य बनाम भजन लाल और अंकुल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य जैसे फैसलों में तय सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि मौजूदा मामले में ऐसा कोई आधार नहीं है, जिससे यह माना जा सके कि FIR कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग या अधिकार का दुरुपयोग है।

    कोर्ट ने कहा,

    “पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के समय कानून के अनिवार्य प्रावधान का उल्लंघन करने के आधार पर ही याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।”

    हाईकोर्ट ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि गिरफ्तारी की इस अवैधता का लाभ महिला जमानत मांगते समय उठा सकती है। यानी गिरफ्तारी की प्रक्रिया में हुई कानूनी चूक जमानत के लिए आधार बन सकती है लेकिन इससे अपने आप NDPS मामले की पूरी कार्यवाही समाप्त नहीं होगी।

    जस्टिस अशोक कुमार जैन ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि तलाशी और गिरफ्तारी करने वाले उपनिरीक्षक ने महिला की गिरफ्तारी से जुड़े भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधान को पढ़ने की भी जरूरत नहीं समझी। इससे स्पष्ट है कि पुलिसकर्मियों को या तो व्यापक प्रशिक्षण की आवश्यकता है या फिर उन्हें ऐसा पुस्तिका-आधारित मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जिससे वे कानून के प्रावधानों का सही तरीके से पालन कर सकें।

    कोर्ट ने इस मामले में राजस्थान के पुलिस महानिदेशक को पुलिसकर्मियों को गिरफ्तारी की कानूनी प्रक्रिया के संबंध में प्रशिक्षण देने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने महिला की याचिका खारिज की।

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