'कानून से ऊपर कोई नहीं': न्यायिक आदेशों की अवहेलना पर राजस्थान हाईकोर्ट ने डिप्टी कलेक्टर को कारण बताओ नोटिस जारी किया
Praveen Mishra
30 Jan 2026 4:19 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने 70 वर्षीय विधवा महिला द्वारा माता-पिता एवं वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत दायर आवेदन पर समयबद्ध निर्णय न देने और अदालत के आदेशों की बार-बार अवहेलना को गंभीरता से लेते हुए डिप्टी जिला कलेक्टर एवं मजिस्ट्रेट के आचरण पर कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह अधिनियम त्वरित राहत के उद्देश्य से बनाया गया है और कोई भी प्राधिकारी मामले को अनिश्चितकाल तक लंबित रखकर अदालत के निर्देशों की जानबूझकर अनदेखी नहीं कर सकता।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने कहा कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और कानून के आदेशों का सार्वत्रिक पालन ही कानून की महिमा, व्यवस्था और न्याय को बनाए रखता है।
अदालत ने कहा—
“उक्त कृत्य पूर्णतः अनुचित है। एक अर्द्ध-न्यायिक प्राधिकारी होने के नाते संबंधित अधिकारी का दायित्व है कि वह न्यायालय के आदेशों का समयबद्ध पालन करे। न्यायालय के आदेशों का पालन न करना निश्चित रूप से घोर कदाचार है, जो कानून के शासन और न्यायिक पदानुक्रम को कमजोर करता है और संबंधित अधिकारी को अनुशासनात्मक कार्रवाई के दायरे में लाता है।”
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता विधवा महिला ने मार्च 2024 में अधिनियम के तहत आवेदन दायर किया था। प्रतिवादियों को उसी वर्ष नोटिस जारी हुए, लेकिन अंतिम बहस तक नहीं हुई। इसके बाद हाईकोर्ट का रुख किया गया, जहां अदालत ने मजिस्ट्रेट को एक माह में निर्णय देने का निर्देश दिया।
निर्देश का पालन न होने पर मई 2025 में पुनः याचिका दायर हुई। तब भी अदालत ने कड़ी चेतावनी के साथ वही निर्देश दोहराए, परंतु मामला फिर भी तय नहीं हुआ। अंततः आवेदन के स्थानांतरण की मांग के साथ तीसरी बार अदालत का दरवाज़ा खटखटाया गया।
इस दौरान अदालत ने मजिस्ट्रेट से अवहेलना पर स्पष्टीकरण मांगा। जवाब में केवल अगली तारीख बताई गई, देरी का कोई कारण नहीं दिया गया। याचिकाकर्ता के वकील के अनुसार, बताई गई तारीख का भी पालन नहीं हुआ और इसके बाद मामला छह बार और टाला गया, अगली तारीख फरवरी 2026 तय की गई।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियां
दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि मजिस्ट्रेट न तो आवेदन तय करने को इच्छुक हैं और न ही अदालत के आदेशों का पालन कर रहे हैं। पीठ ने इसे लोकतंत्र की बुनियाद—कानून के शासन—पर हमला करार दिया।
अदालत ने रेखांकित किया कि अधिनियम के तहत गठित ट्रिब्यूनल निर्धारित समय-सीमा (आमतौर पर 90 दिन) में आवेदन निपटाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य है, इसके बावजूद याचिकाकर्ता को दर-दर भटकाया गया। न्यायालय ने कहा—
“यह मामला अपने आप में एक चौंकाने वाला उदाहरण है, जहां पीठासीन अधिकारी ने केवल तारीखें बढ़ाईं और इस न्यायालय द्वारा दो बार 30 दिन में निर्णय देने के निर्देशों की परवाह नहीं की। ऐसे लापरवाह और असंवेदनशील रवैये को स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस न्यायालय की राय में संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई आवश्यक है।”
आदेश
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने—
संबंधित मजिस्ट्रेट को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर कारण बताने का नोटिस जारी किया;
याचिकाकर्ता का आवेदन उप-खंड अधिकारी (SDO) को स्थानांतरित किया, ताकि एक माह के भीतर निर्णय हो;
मामले को 12 फरवरी 2026 के लिए सूचीबद्ध किया।
अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि वरिष्ठ नागरिकों से जुड़े मामलों में अनावश्यक देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और न्यायालय के आदेशों की अवहेलना पर कड़ी कार्रवाई होगी।

