एड-हॉक के आधार पर दावा खारिज नहीं किया जा सकता: 28 साल की सेवा के बाद कर्मचारी को पक्का करने पर विचार करे सरकार- राजस्थान हाईकोर्ट
Shahadat
16 April 2026 10:37 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक कर्मचारी को राहत दी, जिसने 28 साल से ज़्यादा समय तक सेवा देने के बावजूद, सरकार द्वारा उसे पक्का करने पर विचार न किए जाने के खिलाफ याचिका दायर की थी। सरकार का तर्क था कि उसकी शुरुआती नियुक्ति किसी स्वीकृत पद पर नहीं, बल्कि एड-हॉक (अस्थायी) आधार पर की गई।
जस्टिस आनंद शर्मा की बेंच ने पाया कि राज्य सरकार का यह तर्क कि याचिकाकर्ता को किसी स्वीकृत पद पर नहीं, बल्कि केवल काम के बढ़ते बोझ को संभालने के लिए रखा गया था, लेबर कोर्ट द्वारा पहले ही खारिज किया जा चुका था। लेबर कोर्ट ने पिछली बार याचिकाकर्ता की बर्खास्तगी अवैध करार दी।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने फैसला सुनाया कि यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि याचिकाकर्ता 2 दशक से ज़्यादा समय से नौकरी में है। उसे पक्का किए जाने पर विचार किए जाने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है, जिसके लिए कोर्ट के हस्तक्षेप की आवश्यकता थी।
याचिकाकर्ता को 1997 में दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के तौर पर रखा गया और उसकी सेवाएं अवैध रूप से समाप्त कर दी गईं। लेबर कोर्ट ने इस औद्योगिक विवाद का निपटारा याचिकाकर्ता के पक्ष में किया। सरकार ने इस फैसले को सिंगल बेंच और उसके बाद कोर्ट की डिवीज़न बेंच में चुनौती दी, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली।
कोर्ट के आदेशों से असंतुष्ट होकर सरकार ने इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी याचिका खारिज की गई। इसके बाद याचिकाकर्ता को नौकरी पर वापस (बहाल) रख लिया गया।
याचिकाकर्ता ने यह तर्क देते हुए याचिका दायर की कि नौकरी पर वापस रखे जाने के बाद से उसे नियमित कर्मचारियों के समान ही काम करने के बावजूद बहुत कम वेतन दिया जा रहा है। उसे पक्का किए जाने पर विचार नहीं किया जा रहा था।
इसके विपरीत सरकार ने यह तर्क दिया कि याचिकाकर्ता को किसी स्वीकृत पद के लिए चयन की किसी नियमित प्रक्रिया के तहत नियुक्त नहीं किया गया। बल्कि, उसे केवल काम के बढ़ते बोझ को संभालने के लिए रखा गया, इसीलिए 2001 में उसकी सेवाएं समाप्त करने का प्रयास किया गया।
आगे यह भी तर्क दिया गया कि भले ही उसे नौकरी पर वापस रख लिया गया हो, लेकिन यह बहाली कोर्ट के आदेशों के कारण हुई; इसे इस रूप में नहीं देखा जा सकता कि विभाग ने अपनी मर्ज़ी से याचिकाकर्ता को नौकरी पर जारी रखा है।
दोनों पक्षकारों के तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता की 28 साल से ज़्यादा की सेवा और उसे अब तक नियमित वेतन न दिए जाने के तथ्य को ध्यान में रखा। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सरकार द्वारा उठाए गए तर्कों पर पहले ही विचार किया जा चुका है। इसके बावजूद याचिकाकर्ता की बर्खास्तगी को अवैध ही माना गया। अतः, याचिकाकर्ता सेवा में बना रहा और वह नियमितीकरण के लिए विचार किए जाने का हकदार था।
सार्वजनिक रोज़गार से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता के नियमितीकरण पर विचार करे। यदि वह उपयुक्त पाया जाता है, तो उसे ऐसे नियमितीकरण के लाभ प्रदान करे।
तदनुसार, याचिका स्वीकार की गई।
Title: Shyam Lal v Senior Chemist, Public Health and Engineering Department & Anr.

