आपराधिक मामलों से जुड़ी रिट याचिकाएं 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' के रूप में होंगी दर्ज, राजस्थान हाईकोर्ट की फुल बेंच का फैसला
Praveen Mishra
3 Nov 2026 5:20 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि आपराधिक मामलों से उत्पन्न होने वाली रिट याचिकाओं को अलग से 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' के रूप में दर्ज किया जाएगा और संबंधित नियमों एवं रोस्टर के अनुसार उचित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए रखा जाएगा।
चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल, जस्टिस समीर जैन और जस्टिस अनूपरूप सिंघी की फुल बेंच ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट नियम, 1952 के नियम 315(1)(h) के तहत आपराधिक मामलों से संबंधित रिट याचिकाओं का आपराधिक मामलों के रूप में पंजीकरण अनिवार्य है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी याचिकाओं को सिविल रिट पिटीशन के रूप में दर्ज करना नियमों के प्रावधानों के अनुरूप नहीं होगा।
'जिया बनाम राजस्थान सरकार' मामले में दिए गए निर्देश पलटे
फुल बेंच ने Jiya v. Government of Rajasthan [2026 LiveLaw (Raj) 273] मामले में डिवीजन बेंच द्वारा दिए गए निर्देशों को उस सीमा तक पलट दिया, जिसमें रजिस्ट्री को आपराधिक मामलों से संबंधित याचिकाएं 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' के नाम से दर्ज नहीं करने का निर्देश दिया गया था।
दरअसल, एक अन्य रिट याचिका की सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच ने पहले दिए गए जिया फैसले के निर्देशों और राजस्थान हाईकोर्ट नियमों के बीच विरोधाभास पाया था। इसके बाद इस कानूनी सवाल को फुल बेंच के पास भेजा गया था कि क्या आपराधिक मामलों से उत्पन्न रिट याचिकाओं को नियम 315(1)(h) के तहत आपराधिक मामलों के रूप में दर्ज और वर्गीकृत किया जाना चाहिए।
नियम 315(1)(h) में क्या प्रावधान है?
फुल बेंच ने राजस्थान हाईकोर्ट नियम, 1952 के नियम 315 का परीक्षण किया।
कोर्ट ने पाया कि नियम 315(1)(h) के तहत आपराधिक मामले में संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट जारी करने के आवेदन को दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 491 के तहत जमानत संबंधी आवेदन और अदालत की अवमानना की कार्यवाही के समान श्रेणी में रखा गया है।
इन सभी मामलों को प्रस्तुत किए जाने के बाद 'क्रिमिनल मिसलेनियस केस' के रूप में पंजीकृत और नंबर दिया जाना है।
कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले से जुड़ी रिट याचिकाओं को सिविल रिट पिटीशन के रूप में दर्ज करने से वे आपराधिक मामलों की श्रेणी से बाहर हो जाती हैं, जो नियम 315(1)(h) के विपरीत है।
केस की कैटेगरी का सुनवाई पर भी पड़ता है असर
फुल बेंच ने स्पष्ट किया कि संविधान में सिविल या क्रिमिनल रिट के नाम से अलग-अलग संवैधानिक क्षेत्राधिकार निर्धारित नहीं किए गए हैं। हालांकि, हाईकोर्ट को मामलों की प्रकृति, विषय और लागू रोस्टर के अनुसार अलग-अलग पीठों के बीच न्यायिक कार्य बांटने का अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि किसी मामले का नामकरण भले ही रजिस्ट्री के स्तर पर किया जाने वाला वर्गीकरण हो, लेकिन इसका प्रभाव केवल प्रशासनिक या औपचारिक नहीं है। इससे यह तय हो सकता है कि मामले की सुनवाई किस रोस्टर की पीठ के समक्ष होगी।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रिया संबंधी वर्गीकरण का उद्देश्य न्यायिक अधिकार क्षेत्र के उचित इस्तेमाल को आसान बनाना होना चाहिए, न कि उसमें बाधा उत्पन्न करना।
'जिया' फैसले को इस सीमा तक Per Incuriam माना
फुल बेंच ने कहा कि जिया मामले में दिए गए फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट नियमों के नियम 315(1)(h) के अनिवार्य प्रावधान पर विचार नहीं किया गया था।
इसलिए, जहां तक उस फैसले में आपराधिक मामलों से जुड़ी रिट याचिकाओं को क्रिमिनल रिट पिटीशन के रूप में दर्ज करने पर रोक लगाई गई थी, वहां तक उसे Per Incuriam यानी प्रासंगिक कानूनी प्रावधान पर विचार किए बिना दिया गया फैसला माना जाएगा।
कोर्ट ने इस संबंध में Actus Curiae Neminem Gravabit के सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसका अर्थ है कि अदालत के किसी कार्य से किसी व्यक्ति को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।
हाईकोर्ट का अंतिम निर्देश
फुल बेंच ने निर्देश दिया कि फैसले के बाद दाखिल होने वाली वे सभी रिट याचिकाएं, जो आपराधिक मामलों से संबंधित हैं और नियम 315(1)(h) के दायरे में आती हैं, उन्हें 'क्रिमिनल रिट पिटीशन' के रूप में वर्गीकृत और पंजीकृत किया जाए।
ऐसी याचिकाओं को राजस्थान हाईकोर्ट के लागू नियमों और रोस्टर के अनुसार उचित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए रखा जाएगा।

