पति की तलाक याचिका का बदला लेने के लिए अलग होने के 20 महीने बाद दर्ज की गई FIR: हाईकोर्ट ने पत्नी की क्रूरता की FIR खारिज की

Praveen Mishra

18 Nov 2025 3:36 PM IST

  • पति की तलाक याचिका का बदला लेने के लिए अलग होने के 20 महीने बाद दर्ज की गई FIR: हाईकोर्ट ने पत्नी की क्रूरता की FIR खारिज की

    राजस्थान हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज की गई धारा 498ए की क्रूरता FIR को रद्द करते हुए कहा है कि यह मामला स्पष्ट रूप से प्रतिशोध (retaliation) के तौर पर दायर किया गया था। अदालत ने पाया कि पत्नी ने पति से अलग रहने के लगभग 20 महीने बाद यह FIR दर्ज कराई, और वह भी तब जब पति ने तलाक की कार्यवाही शुरू की। इस तरह की देरी और परिस्थितियाँ यह दर्शाती हैं कि मामला केवल बदला लेने के लिए दर्ज किया गया था।

    जस्टिस आनंद शर्मा की बेंच ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि पत्नी ने तलाक याचिका का विरोध करते हुए जो जवाब दाखिल किया था, उसमें उस क्रूरता या दहेज उत्पीड़न का कोई उल्लेख नहीं था जिसके बारे में उसने बाद में FIR में आरोप लगाए। यह विरोधाभास स्वयं इस बात की ओर संकेत करता है कि FIR तथ्यात्मक घटनाओं पर आधारित नहीं, बल्कि तलाक के मुकदमे के जवाब में की गई कार्रवाई थी।

    मामले के तथ्यों से यह भी सामने आया कि पत्नी ने तलाक की कार्यवाही के दौरान अचानक अपना रुख बदला और “नो ऑब्जेक्शन” दे दी, जिसके बाद अदालत ने तलाक का डिक्री पास कर दिया। तलाक मिलते ही पत्नी ने जल्द ही किसी अन्य व्यक्ति से विवाह कर लिया। हाईकोर्ट के अनुसार यह पूरा घटनाक्रम उस आशंका को मजबूत करता है कि 498A की कार्यवाही सद्भावना से नहीं, बल्कि “वेंडेटा” यानी बदले की नीयत से दर्ज की गई थी।

    पति और पत्नी का विवाह वर्ष 2012 में हुआ था, लेकिन शीघ्र ही विवाद उत्पन्न हो गए। दोनों के बीच एक लिखित समझौता भी हुआ जिसमें पत्नी ने यह वादा किया था कि वह 498A की कार्रवाई नहीं करेगी, और दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लेने का निर्णय किया था। लेकिन जब समय आने पर पति ने संयुक्त तलाक याचिका दाखिल करने को कहा, तो पत्नी ने इनकार कर दिया। इसके बाद पति ने एकतरफा तलाक याचिका दायर की, और इसी के तुरंत बाद पत्नी ने 498A की FIR दर्ज करा दी।

    हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड और पक्षकारों के तर्कों का परीक्षण करने के बाद कहा कि 20 महीने तक FIR न करना और फिर तलाक की कार्यवाही शुरू होने के तुरंत बाद इसे दर्ज करना शिकायतकर्ता की नीयत पर गंभीर संदेह पैदा करता है। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने Dara Lakshmi Narayana v. State of Telangana मामले में 498A के बढ़ते दुरुपयोग पर चिंता जताई थी, जहाँ इसे पति और उसके परिवार के खिलाफ “निजी दुश्मनी निकालने” का एक साधन बताया गया था।

    इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए,高कोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा दर्ज की गई FIR दुर्भावनापूर्ण, प्रतिशोधपूर्ण और असली तथ्यों पर आधारित नहीं थी। इसलिए अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए पति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

    Next Story