राजस्थान हाईकोर्ट ने सेल डीड की प्रमाणित प्रति पेश करने की याचिका खारिज करने के आदेश को बरकरार रखा मुकदमा दायर होने के 13 साल बाद स्थानांतरित

  • राजस्थान हाईकोर्ट ने सेल डीड की प्रमाणित प्रति पेश करने की याचिका खारिज करने के आदेश को बरकरार रखा मुकदमा दायर होने के 13 साल बाद स्थानांतरित

    राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें वादी दायर होने के 13 साल बाद बिक्री विलेख को रिकॉर्ड पर लाने की वादी की याचिका को खारिज कर दिया गया था, जिसमें कहा गया था कि केवल इसलिए कि मुकदमा वादी के साक्ष्य के चरण में था, इसने वादी को एक दस्तावेज पेश करने का कोई अंतर्निहित अधिकार नहीं दिया जो मुकदमा दायर करने के समय से उनकी जानकारी में था।

    ऐसा करते हुए हाईकोर्ट ने आगे कहा कि वादी ने "इस तरह की देरी के लिए पर्याप्त कारण" नहीं बताया।

    याचिकाकर्ता ने CPC के Order VII Rule 14 के तहत एक आवेदन दायर किया था, जिसमें एक बिक्री विलेख की प्रमाणित प्रति रिकॉर्ड पर लेने की प्रार्थना की गई थी, जिसकी एक फोटोकॉपी 13 साल पहले ही वाद के पास जमा की जा चुकी थी। इस आवेदन को ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

    मुकदमा एक विवादित भूमि के बारे में था जिसे सार्वजनिक उपयोग के लिए छोड़ दिया गया था लेकिन प्रतिवादी द्वारा धोखाधड़ी से बेच दिया गया था। विवाद के उचित स्पष्टीकरण और अधिनिर्णय के लिए, विवादित संपत्ति के उत्तरी हिस्से में मौजूद भूमि का विक्रय विलेख रिकॉर्ड पर लाया जाना था।

    इस बिक्री विलेख की फोटोकॉपी 2011 में दायर वाद के साथ संलग्न की गई थी, हालांकि, दस्तावेजों की सूची में कोई जानकारी नहीं थी कि मूल प्रति मालिक से मंगाई जाएगी। वाद दायर करने के 13 साल बाद ही इस प्रमाणित प्रति को प्राप्त करने के लिए कदम उठाए गए।

    जस्टिस रेखा बोराना ने अपने आदेश में कहा, "इस न्यायालय की राय है कि केवल इस कारण से कि मुकदमा वादी के साक्ष्य के चरण में है, वादी को एक दस्तावेज पेश करने का कोई अंतर्निहित अधिकार उपलब्ध नहीं है जो मुकदमा दायर करने के समय से ही उनकी जानकारी में था। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं के विद्वान वकील 13 साल की उक्त देरी के लिए कोई पर्याप्त कारण नहीं बता पाए हैं। बेशक, वर्ष 2024 से पहले विचाराधीन बिक्री विलेख की प्रमाणित प्रति प्राप्त करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया था। इसलिए, इस तथ्य पर विचार करते हुए कि वादी को वाद दायर करने की तारीख यानी 08.09.2011 (अनुलग्नक 1) से ही बिक्री विलेख के बारे में पता था, फिर भी 13 साल से अधिक की अवधि के लिए प्रमाणित प्रति को रिकॉर्ड पर रखने का विकल्प नहीं चुना, विद्वान ट्रायल कोर्ट ने आवेदन को खारिज कर दिया।

    आगे यह देखा गया कि ट्रायल कोर्ट के आदेश के अनुसार, याचिकाकर्ताओं (वादी) को पहले ही अपने साक्ष्य का नेतृत्व करने के लिए 13 अवसर दिए जा चुके थे।

    तदनुसार, याचिका खारिज कर दी गई, और यह माना गया था कि ट्रायल कोर्ट आवेदन को खारिज करने में सही था।

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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