राजस्थान हाईकोर्ट ने शिकायतकर्ता के नार्को-टेस्ट से इनकार पर जताई हैरानी, हत्या की नई जांच के दिए आदेश
Shahadat
4 Jun 2026 9:51 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में शिकायतकर्ता का नार्को-टेस्ट करने से संबंधित अधिकारी के इनकार पर हैरानी जताई – जबकि शिकायतकर्ता ने इसके लिए सहमति दी थी – और इनकार का आधार यह बताया गया कि वह हिंदी में पारंगत नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि इसके बजाय अधिकारियों को किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करना चाहिए, जो उस गवाह/संदिग्ध या पीड़ित की मातृभाषा से परिचित हो, जिसकी मौजूदगी में यह टेस्ट किया जा सके। कोर्ट ने आगे कहा कि जांच अधिकारी केवल इस आधार पर जांच बंद नहीं कर सकता कि अज्ञात आरोपी व्यक्ति नहीं मिल पाए।
कोर्ट शिकायतकर्ता की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें मजिस्ट्रेट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें एक हत्या के मामले में 'अंतिम नकारात्मक रिपोर्ट' (Final Negative Report) को स्वीकार कर लिया गया और शिकायतकर्ता की विरोध याचिका को भी खारिज कर दिया गया।
जस्टिस अनूप कुमार धांड की बेंच ने कहा:
"याचिकाकर्ता का नार्को-एनालिसिस टेस्ट करने से इनकार करने के पीछे दिए गए तर्क और दलील को स्वीकार करना काफी चौंकाने वाला और हैरानी भरा है। यदि कोई गवाह किसी विशेष भाषा से परिचित नहीं है या हिंदी भाषा में पारंगत नहीं है तो केवल इसी आधार पर ऐसे व्यक्ति/संदिग्ध/गवाह का नार्को-एनालिसिस टेस्ट करने से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में संबंधित अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करें, जो उस संदिग्ध/गवाह/पीड़ित की मातृभाषा से परिचित हो, जिसकी मौजूदगी में संबंधित नार्को-एनालिसिस टेस्ट किया जा सके।"
कोर्ट ने आगे राय दी कि जांच अधिकारी को केवल इस आधार पर जांच बंद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि छह साल बीत जाने के बाद भी अज्ञात आरोपी व्यक्ति नहीं मिल पाए हैं। "इस कोर्ट को 'नेगेटिव' फ़ाइनल रिपोर्ट जमा करने के लिए दिए गए कारणों में कोई औचित्य नहीं दिखता, यानी, यह कि छह साल से ज़्यादा समय बीत चुका है और अज्ञात आरोपियों का पता लगाने की संभावना बहुत कम है। जांच अधिकारी को सही तरीके से जांच करने की अपनी ज़िम्मेदारी और कर्तव्यों से बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती और उसे इस मामले में जांच सिर्फ़ इस आधार पर बंद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि अज्ञात आरोपी नहीं मिल रहे हैं।
कुछ मामले ऐसे होते हैं, जैसे 'अंधे कत्ल' (blind murders), जिनमें आरोपी अज्ञात होते हैं और जाँच अधिकारी का यह कर्तव्य होता है कि वह सभी ज़रूरी कोशिशें करके ऐसे आरोपियों का पता लगाए। हालांकि, इस मामले में जांच अधिकारी ने सही तरीके से ऐसी कोशिशें नहीं कीं और जांच अधिकारी द्वारा 'नेगेटिव' फ़ाइनल रिपोर्ट में दर्ज किए गए ऊपर बताए गए कारणों के आधार पर मामला बंद कर दिया गया।"
याचिकाकर्ता-शिकायतकर्ता ने प्रतिवादी के ख़िलाफ़ एक FIR दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया गया कि प्रतिवादी ने उसके भाई की हत्या की।
यह दलील दी गई कि बिना निष्पक्ष और तटस्थ तरीके से जांच किए, पुलिस ने एक 'नेगेटिव रिपोर्ट' (Negative Report) दायर की, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। याचिकाकर्ता ने इसके ख़िलाफ़ एक विरोध याचिका (protest petition) दायर की, जिसे भी ख़ारिज कर दिया गया।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि जांच के दौरान, जांच अधिकारी द्वारा याचिकाकर्ता के नार्को-एनालिसिस टेस्ट के लिए एक आवेदन जमा किया गया। याचिकाकर्ता ने भी इसके लिए अपनी सहमति दी थी। हालांकि, संबंधित अधिकारी ने इस आधार पर टेस्ट करने से इनकार कर दिया कि याचिकाकर्ता हिंदी में अच्छी तरह बात नहीं कर पाता।
इसके अलावा, कोर्ट ने 'नेगेटिव' फ़ाइनल रिपोर्ट दायर करने के लिए दिए गए इस औचित्य को ख़ारिज किया कि छह साल से ज़्यादा समय बीत चुका है और अज्ञात आरोपियों का पता लगाने की संभावना बहुत कम है।
कोर्ट ने यह राय दी,
तदनुसार, कोर्ट ने मजिस्ट्रेट द्वारा पारित आदेश रद्द किया और मामले को आगे की जांच के लिए जांच अधिकारी के पास वापस भेज दिया; इस जांच में शिकायतकर्ता-याचिकाकर्ता या अन्य संदिग्धों/गवाहों का नार्को-एनालिसिस टेस्ट भी शामिल है, यदि जाँच अधिकारी को ऐसा करना ज़रूरी लगता है।
Title: Feliram v State of Rajasthan

