सरकारी अस्पताल में स्टेंट न मिलने पर प्राइवेट दुकान से खरीदने को मजबूर मरीज़ को पूरा पैसा वापस पाने का हक: राजस्थान हाईकोर्ट

  • सरकारी अस्पताल में स्टेंट न मिलने पर प्राइवेट दुकान से खरीदने को मजबूर मरीज़ को पूरा पैसा वापस पाने का हक: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने सिंगल जज का वह आदेश सही ठहराया, जिसमें राज्य सरकार को निर्देश दिया गया कि वह मरीज़ को सरकारी अस्पताल में इलाज के दौरान लगाए गए स्टेंट का पूरा खर्च वापस करे। ये स्टेंट अस्पताल में उपलब्ध न होने के कारण प्राइवेट सप्लायर से खरीदे गए।

    हेल्थकेयर और किफायती इलाज का अधिकार आर्टिकल 21 का हिस्सा बताते हुए जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की डिवीज़न बेंच ने कहा कि मेडिकल इलाज के खर्च की वापसी (रीइंबर्समेंट) से जुड़े नियमों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।

    मामले की बात करें तो मरीज़ को दिल की बीमारी थी और जोधपुर के मथुरा दास माथुर अस्पताल में उसकी सर्जरी हुई, जिसके दौरान 4 स्टेंट लगाए गए। चूंकि अस्पताल में स्टेंट उपलब्ध नहीं है, इसलिए उन्हें प्राइवेट सप्लायर से खरीदा गया और उनका खर्च लगभग 2.70 लाख रुपये आया था। इसमें से मरीज़ को केवल 1.70 लाख रुपये ही वापस किए गए।

    मरीज़ ने कोर्ट में याचिका दायर की, जिस पर सिंगल जज ने उसके पक्ष में फैसला सुनाया और राज्य सरकार को स्टेंट की पूरी कीमत वापस करने का निर्देश दिया। राज्य सरकार ने इस आदेश को डिवीज़न बेंच के सामने चुनौती दी।

    राज्य सरकार ने तर्क दिया कि यह फैसला गलत है, क्योंकि इसमें 3 से ज़्यादा स्टेंट के खर्च की वापसी का निर्देश दिया गया, जिसकी राजस्थान सिविल सेवा (मेडिकल अटेंडेंस) नियम, 2013 के अपेंडिक्स IX के तहत अनुमति नहीं थी।

    इसके विपरीत मरीज़ ने तर्क दिया कि अगर किसी मरीज़ का इलाज सरकारी अस्पताल में होता है, तो सभी उपकरण उपलब्ध कराना अस्पताल की ज़िम्मेदारी है। अगर कोई इस्तेमाल होने वाली चीज़ (कंज्यूमेबल) उपलब्ध नहीं होती है तो लाभार्थी को उसे प्राइवेट सप्लायर से खरीदना पड़ता है, ऐसी स्थिति में उसे पूरा खर्च वापस मिलना चाहिए।

    दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने 'कंज्यूमर एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का ज़िक्र किया। इस फैसले में कहा गया कि नौकरी के दौरान या रिटायरमेंट के बाद अपनी सेहत और ताकत बनाए रखने के लिए स्वास्थ्य और मेडिकल देखभाल का अधिकार, आर्टिकल 21 के तहत एक वर्कर का मौलिक अधिकार है।

    इसके अलावा, कोर्ट ने 'इन री: कोविड-19 मरीज़ों का सही इलाज और अस्पतालों आदि में शवों का सम्मानजनक प्रबंधन' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी ज़िक्र किया। इस फैसले में कहा गया कि स्वास्थ्य का अधिकार आर्टिकल 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है और इसमें किफायती इलाज का अधिकार भी शामिल है।

    इस संदर्भ में, कोर्ट ने कहा,

    "यह बिल्कुल साफ़ है कि स्वास्थ्य का अधिकार भारत के संविधान के आर्टिकल 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है... इसलिए मेडिकल इलाज के खर्च की भरपाई (रीइम्बर्समेंट) से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।"

    इसके अनुसार, सिंगल जज के फैसले को बरकरार रखा गया और राज्य को निर्देश दिया गया कि वह प्रतिवादी को बाकी बची हुई रकम का भुगतान करे।

    Title: Chairman cum Managing Director, Jodhpur Vidhyut Vitran Nigam Limited & Ors. v Jagdish Chandra Bissa

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story