पिछली छोटी सज़ाएं लगातार 'उत्कृष्ट' सर्विस रिकॉर्ड पर भारी नहीं पड़ सकतीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने अनिवार्य रिटायरमेंट रद्द किया

Shahadat

4 Feb 2026 10:11 AM IST

  • पिछली छोटी सज़ाएं लगातार उत्कृष्ट सर्विस रिकॉर्ड पर भारी नहीं पड़ सकतीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने अनिवार्य रिटायरमेंट रद्द किया

    राजस्थान हाईकोर्ट ने "अक्षमता" के आधार पर पुलिस इंस्पेक्टर का अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने इसे मनमाना और छोटी सज़ाओं पर चुनिंदा रूप से निर्भर बताया, जबकि उसके लगातार उत्कृष्ट सर्विस रिकॉर्ड को नज़रअंदाज़ किया गया, जिसमें "अच्छा" और "बहुत अच्छा" प्रदर्शन दिखाया गया।

    जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने कहा कि राज्य राजस्थान सिविल सर्विसेज (पेंशन) नियम, 1996 ("नियम") के नियम 53(1) और कार्मिक विभाग (DoP) द्वारा 21 अप्रैल, 2000 को जारी सर्कुलर के तहत बाध्यकारी दिशानिर्देशों का पालन करने में विफल रहा, जिसमें कहा गया कि यदि "अक्षमता" के आधार पर अनिवार्य रिटायरमेंट का प्रस्ताव है, तो कर्मचारी के पिछले 5 वर्षों के प्रदर्शन पर मुख्य रूप से विचार किया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा,

    "प्रतिवादियों की कार्रवाई में स्पष्ट विरोधाभास और आत्म-विरोध प्रतीत होता है... जिस व्यक्ति के प्रदर्शन को उत्कृष्ट और शानदार माना गया, उसे उसी समय अक्षम करार नहीं दिया जा सकता। परिणामस्वरूप उसे बाहर का रास्ता नहीं दिखाया जा सकता। यह घोर विसंगति निष्पक्षता और तर्कसंगतता की जड़ पर प्रहार करती है और विचाराधीन कार्रवाई को बिना सोचे-समझे किए जाने के कारण दूषित करती है।"

    याचिकाकर्ता पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत था और उसके वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार उसका लगातार सराहनीय सर्विस रिकॉर्ड था। हालांकि, राज्य ने बिना कोई कारण बताए या ऊपर बताए गए आदेशों का पालन किए बिना "अक्षमता" के आधार पर उसके अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश जारी किया। इसलिए याचिका दायर की गई।

    दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि 2000 और 2019 के बीच याचिकाकर्ता को छोटी सज़ाएँ दी गईं। हालांकि, ये प्रकृति में छोटी थीं और समाप्त हो चुकी थीं।

    अप्रैल 2000 में DoP द्वारा जारी सर्कुलर द्वारा निर्धारित आदेश पर ज़ोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि राज्य ने याचिकाकर्ता के सर्विस रिकॉर्ड को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया और उनका फैसला मुख्य रूप से पुरानी और छोटी सज़ाओं पर आधारित है।

    कोर्ट ने कहा कि अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश देने के लिए केवल ऐसी समाप्त हो चुकी सज़ाओं पर निर्भर रहना, रिटायरमेंट को उसी तरह की गलतियों के लिए दूसरी सज़ा का चरित्र देना था, जो कानून के तहत स्वीकार्य नहीं था।

    यह कहा गया कि नियमों का नियम 53(1) जो अनिवार्य रिटायरमेंट की शक्ति प्रदान करता है, वह अनिवार्य रिटायरमेंट की आड़ में सज़ा का प्रावधान नहीं करता। ऐसी शक्ति का इस्तेमाल सख्ती से जनहित में किया जाना चाहिए और वह भी कर्मचारी के सर्विस रिकॉर्ड और ठोस सबूतों के पूरे मूल्यांकन के आधार पर।

    कोर्ट ने इस संबंध में कहा,

    “'जिसकी उपयोगिता खत्म हो गई' इस वाक्यांश का मतलब अक्षमता, नाकाबिलियत या संदिग्ध ईमानदारी का एक लगातार पैटर्न है, जो सर्विस रिकॉर्ड में साफ तौर पर दिखे, न कि सिर्फ़ एक व्यक्तिपरक धारणा या प्रतिकूल एंट्री पर चुनिंदा भरोसा। नियम 53(1) के तहत शक्ति का इस्तेमाल जनहित और पूरे सर्विस प्रोफ़ाइल के वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन की दोहरी कसौटी को पूरा करना चाहिए।”

    इस पृष्ठभूमि में राज्य का रवैया स्वाभाविक रूप से मनमाना और कानूनी रूप से गलत माना गया, जो निष्पक्षता और तर्कसंगतता की जड़ पर चोट करता है।

    इसलिए याचिकाकर्ता की अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश रद्द किया गया और राज्य को उन्हें फिर से बहाल करने का निर्देश दिया गया।

    Title: Arvind Charan v the State of Rajasthan & Ors.

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