सिर्फ़ कर्मचारी का जवाब रिकॉर्ड करना कि उस पर 'विचार किया गया', दिखावा मात्र: राजस्थान हाईकोर्ट

  • सिर्फ़ कर्मचारी का जवाब रिकॉर्ड करना कि उस पर विचार किया गया, दिखावा मात्र: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर डिस्कॉम के ज़ोनल चीफ इंजीनियर पर सज़ा लगाने वाले आदेश और उस सज़ा को सही ठहराने वाला अपीलीय आदेश रद्द किया, क्योंकि उनके बचाव में दिए गए जवाब की बातों पर कोई विचार नहीं किया गया।

    जस्टिस आनंद शर्मा की बेंच ने कहा कि आदेश में सिर्फ़ यह लिख देना कि सामग्री पर विचार किया गया, एक खोखली औपचारिकता और दिखावा मात्र है। विचार करने का मतलब है दिमाग का सक्रिय इस्तेमाल करना और संबंधित सामग्री पर सोचना, विचार-विमर्श करना और उसे परखना।

    बता दें, कोर्ट जयपुर डिस्कॉम के ज़ोनल चीफ इंजीनियर द्वारा उनकी एक सालाना ग्रेड इंक्रीमेंट रोकने के सज़ा वाले आदेश के खिलाफ़ चुनौती पर सुनवाई कर रहा था। इस आदेश को अपीलीय अथॉरिटी ने भी सही ठहराया था।

    याचिकाकर्ता विभाग में जूनियर इंजीनियर के तौर पर काम कर रहा था, जब एक ट्रांसफॉर्मर खराब हो गया। उसे अनियमितताओं और प्रतिवादी को भारी नुकसान पहुंचाने की कोशिश के आरोपों के साथ एक नोटिस दिया गया।

    उसने एक जवाब दाखिल किया, जिसमें सभी आरोपों को साफ तौर पर नकारा गया। इसके बाद प्रतिवादी ने सज़ा का आदेश पारित किया, जिसे अपीलीय अथॉरिटी ने भी सही ठहराया।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आदेश को देखने मात्र से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि उसके जवाब की बातों को नज़रअंदाज़ किया गया और तथ्यों की जांच रिपोर्ट का विश्लेषण किए बिना ही अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने याचिकाकर्ता को दोषी पाया।

    इसके विपरीत, राज्य ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ़ गंभीर कदाचार के आरोप थे। साथ ही आदेशों में लिखी बातों से यह स्पष्ट था कि सज़ा बहुत सोच-समझकर ही दी गई। जवाब पर विचार करने का स्पष्ट ज़िक्र है।

    इसके अलावा, राज्य ने कहा कि वैसे भी, सज़ा का आदेश और अपीलीय आदेश पारित करने के कारण कॉर्पोरेशन की फ़ाइल में मौजूद थे, इसलिए विचार न करने का आरोप पूरी तरह से गलत था। इस आधार पर आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता। दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने 'राजेश कुमार तिवारी बनाम जयपुर विद्युत वितरण निगम' मामले का ज़िक्र किया, जिसमें तथ्यों की स्थिति एक जैसी थी। कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में दोषी कर्मचारी द्वारा पेश किए गए बचाव पक्ष पर विचार करना कोई दिखावटी औपचारिकता या सिर्फ़ प्रक्रियात्मक ज़रूरत को पूरा करने के लिए किया जाने वाला काम नहीं है।

    यह राय दी गई कि ऐसे विचार को सज़ा के आदेश में ही ठोस कारणों के साथ दिखाया जाना चाहिए।

    आगे यह भी कहा गया,

    “प्रतिवादियों के वकील की यह दलील कि भले ही विवादित आदेश में कारण साफ़ तौर पर न लिखे हों, लेकिन वे प्रतिवादी-निगम के ऑफ़िस की फ़ाइलों की नोट-शीट में साफ़ तौर पर दर्ज हैं, पूरी तरह से बेबुनियाद और गलत है। सज़ा का आदेश और अपील का आदेश दोषी कर्मचारी के लिए गंभीर नुकसान और न्याय में बाधा का कारण बनता है, क्योंकि यह सर्विस रिकॉर्ड में भी दिखता है और उसके भविष्य के प्रमोशन/फ़ायदों आदि पर भी बुरा असर डालता है। इसलिए दोषी को दोषी ठहराने के कारण और सज़ा देने के किसी खास नतीजे पर पहुंचने के कारण अनुशासनात्मक आदेश और अपील के आदेश, दोनों का हिस्सा होने चाहिए।”

    आदेश में यह भी कहा गया कि आरोपों की गंभीरता का इस्तेमाल कारण दर्ज करने की ज़रूरत को नज़रअंदाज़ करने के बहाने के तौर पर नहीं किया जा सकता। गंभीर कदाचार वाले मामलों में भी अधिकारी का यह फ़र्ज़ था कि वह कारणों के ज़रिए दिखाए कि आरोप कैसे साबित हुए।

    इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने पहले के फ़ैसले से सहमति जताई और कहा कि अनुशासनात्मक और अपील दोनों ही चरणों में कारणों पर विचार न किए जाने की स्थिति में सज़ा का आदेश या अपील का आदेश बरकरार नहीं रखा जा सकता।

    इसके अनुसार, आदेशों को रद्द किया गया और याचिकाकर्ता को उससे जुड़े फ़ायदे पाने का हकदार माना गया, जो उसे 60 दिनों के भीतर दिए जाने थे।

    Title: Deepak Meena v the Chairman cum Managing Director, JVVNL & Ors.

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