कन्हैया लाल हत्याकांड: राजस्थान हाईकोर्ट ने आठ आरोपियों के खिलाफ UAPA के तहत लगाए गए आरोपों को बरकरार रखा

  • कन्हैया लाल हत्याकांड: राजस्थान हाईकोर्ट ने आठ आरोपियों के खिलाफ UAPA के तहत लगाए गए आरोपों को बरकरार रखा

    राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर के दर्जी कन्हैया लाल की 2022 में हुई हत्या के मामले में आठ आरोपियों के खिलाफ 'गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत लगाए गए आरोपों को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करते समय उसे 'मिनी-ट्रायल' करने की जरूरत नहीं है, बल्कि केवल यह देखना है कि क्या अभियोजन पक्ष द्वारा पेश की गई सामग्री से प्रथम दृष्टया (Prima Facie) कोई मामला बनता है।

    चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस समीर जैन की खंडपीठ ने कहा कि आरोपियों की दलीलें सबूतों के मूल्यांकन से जुड़ी हैं, जिन पर केवल ट्रायल के दौरान ही फैसला लिया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि इस चरण में दखल देना अभियोजन की कार्यवाही में "अनुचित हस्तक्षेप" होगा।

    खंडपीठ ने कहा,

    "दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर विचार करने के बाद इस कोर्ट को ऐसा कोई ठोस आधार नहीं मिला, जिसके चलते आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने वाले आदेशों में दखल दिया जाए। इस चरण में कोर्ट को केवल यह देखना है कि क्या अभियोजन पक्ष की सामग्री से आरोपियों के खिलाफ प्रथम दृष्टया कोई मामला बनता है या कोई गंभीर संदेह पैदा होता है। इस चरण में सबूतों की बारीकी से जांच करके यह तय करने की जरूरत नहीं है कि आरोपी वास्तव में दोषी हैं या निर्दोष।"

    कोर्ट ने उन आपत्तियों पर भी बात की, जिनमें बरामद वीडियो, सार्वजनिक शांति को प्रभावित करने वाले विशिष्ट बयानों का अभाव और आरोपियों के किसी गैरकानूनी संगठन से न जुड़े होने का दावा किया गया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष की सामग्री की पूरी जांच किए बिना, इन बातों को "आरोप मुक्त करने (Discharge) का निर्णायक आधार" नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने कहा कि साजिश के आरोपों और घटना से जुड़ी परिस्थितियों को समग्र रूप से (पूरी तरह से) समझने और परखने की आवश्यकता है।

    अदालत ने कहा,

    "साजिश के प्रत्यक्ष सबूतों का न होना, अपने आप में निर्णायक नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसी सहमति का अनुमान परिस्थितियों के कुल प्रभाव से लगाया जा सकता है। 'स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम सोम नाथ थापा', 'फिरोजुद्दीन बशीरुद्दीन और अन्य बनाम स्टेट ऑफ केरल' और 'यश पाल मित्तल बनाम स्टेट ऑफ पंजाब' जैसे मामलों में इसे मान्यता दी गई... अपीलकर्ताओं द्वारा उठाए गए तर्क मुख्य रूप से सबूतों के मूल्यांकन से जुड़े हैं, जिन पर ट्रायल के दौरान फैसला लिया जाना है। इस चरण में दखल देना, अभियोजन की कार्यवाही में अनुचित तरीके से पहले ही हस्तक्षेप करने जैसा होगा।"

    अदालत उन दो अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत आरोपियों पर IPC, UAPA और आर्म्स एक्ट, 1959 के तहत आरोप तय किए गए। अपीलकर्ताओं का तर्क था कि UAPA के तहत आरोप तय करना एक स्पष्ट गलती है और यह बिना सोचे-समझे लिया गया निर्णय है।

    अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि FIR और जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों के अनुसार, आरोपियों ने मृतक कन्हैया लाल की हत्या की साजिश रची थी। यह साजिश कथित तौर पर एक टीवी शो के दौरान नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर मोहम्मद साहब के बारे में की गई कुछ टिप्पणियों के कारण रची गई।

    आरोप है कि मृतक ने उन टिप्पणियों को सोशल मीडिया पर शेयर और फॉरवर्ड किया, जिससे आरोपी भड़क गए और उन्होंने इस अपराध को अंजाम दिया। FIR में लगाए गए आरोपों के अनुसार, मृतक की सोशल मीडिया गतिविधियों से नाराज होकर आरोपियों ने अपने साझा इरादे को पूरा करने के लिए उसकी हत्या कर दी। अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि इस घटना से पहले धमकियां दी गईं और यह मामला सोशल मीडिया पर किए गए उस मैसेज को शेयर और फॉरवर्ड करने से जुड़ा है। साथ ही यह भी आरोप है कि इस कृत्य का उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ना था।

    आरोपियों के वकील ने दलील दी कि बरामद वीडियो में ऐसे कोई शब्द या भाव नहीं थे, जिनसे सार्वजनिक शांति भंग होने की संभावना हो। FIR में ऐसा कोई स्पष्ट आरोप नहीं था कि यह धमकी किसी खास व्यक्ति, समुदाय, जाति या धर्म के खिलाफ दी गई।

    इसके अलावा, वकील ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि आरोपी किसी गैर-कानूनी संगठन से जुड़े थे, या यह कि कथित काम किसी ऐसे संगठन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए किए गए।

    इसके विपरीत, राज्य की ओर से दलील दी गई कि UAPA की धारा 18 के तहत 'आपराधिक साजिश' (Criminal Conspiracy) का दायरा बहुत व्यापक है। इसमें न केवल किसी आतंकी घटना को अंजाम देना शामिल है, बल्कि ऐसी घटना की साजिश रचना, कोशिश करना, उकसाना और घटना को अंजाम देने की तैयारी करना भी शामिल है। साजिश के अस्तित्व का पता लगाने के लिए, कथित घटना से पहले की परिस्थितियां बहुत महत्वपूर्ण होती हैं।

    यह भी कहा गया कि किसी बयान की प्रकृति और उसके अर्थ को केवल कुछ शब्दों के होने या न होने के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। बरामद वीडियो की सामग्री, उन्हें रिकॉर्ड करने की परिस्थितियां और घटना के साथ उनका कथित संबंध - ये सभी ऐसे मामले हैं, जिनकी सुनवाई के दौरान सबूतों की उचित जांच और समीक्षा की जानी चाहिए।

    इस बात पर भी जोर दिया गया कि क्या ये सबूत UAPA के तहत अपराधों को साबित करते हैं, यह सवाल सबूत पेश किए जाने के बाद ही तय किया जा सकता है; इसलिए अभी इस चरण में ऐसा नहीं किया जा सकता।

    अपीलें खारिज कर दी गईं।

    Case Title : Mohammad Riyaz Attari & Anr. v the National Investigation Agency, and other connected petitions

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