लोक सेवकों पर FIR का आदेश यूं ही नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- पहले कानूनी सुरक्षा प्रावधानों का पालन जरूरी

Amir Ahmad

15 April 2026 5:23 PM IST

  • लोक सेवकों पर FIR का आदेश यूं ही नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा- पहले कानूनी सुरक्षा प्रावधानों का पालन जरूरी

    राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि मजिस्ट्रेट बिना विचार किए या यांत्रिक तरीके से लोक सेवकों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश नहीं दे सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223(2) के तहत निर्धारित सुरक्षा प्रावधानों का पालन अनिवार्य है।

    जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए स्पेशल कोर्ट द्वारा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश रद्द किया और मामले को पुनः विचार के लिए ट्रायल कोर्ट को भेज दिया।

    अदालत ने कहा कि धारा 175(3) के तहत FIR दर्ज करने का आदेश देते समय भी मजिस्ट्रेट को अपने न्यायिक विवेक का उपयोग करना आवश्यक है। यह प्रक्रिया केवल औपचारिक नहीं बल्कि गंभीर न्यायिक मूल्यांकन की मांग करती है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 223(2) का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोक सेवकों के खिलाफ आपराधिक कानून का दुरुपयोग प्रतिशोध या उत्पीड़न के साधन के रूप में न हो। इस प्रावधान के तहत FIR दर्ज करने से पहले संबंधित लोक सेवक को अपना पक्ष रखने का अवसर देना और उसके सीनियर अधिकारी से तथ्यात्मक रिपोर्ट लेना जरूरी होता है।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “कानून यह अनुमति नहीं देता कि शिकायत को बिना जांचे-परखे सीधे FIR के लिए भेज दिया जाए। मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह शिकायत का सावधानीपूर्वक अध्ययन करे और तय करे कि मामला किस प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।”

    मामले में यह भी सामने आया कि दोनों पक्षकारों के बीच पहले से आपराधिक विवाद और क्रॉस FIR दर्ज थीं। संबंधित शिकायत में भी पहले निगेटिव फाइनल रिपोर्ट दी जा चुकी थी, जिससे यह संकेत मिलता था कि शिकायत प्रतिशोध की भावना से प्रेरित हो सकती है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपों को सीधे स्वीकार करना उचित नहीं है बल्कि संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है ताकि एक ओर शिकायतकर्ता को न्याय मिले और दूसरी ओर लोक सेवकों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाया जा सके।

    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 223 एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है, जो यह सुनिश्चित करता है कि आपराधिक कानून का उपयोग सोच-समझकर और उचित आधार पर ही किया जाए।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने स्पेशल कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।

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