चार्जशीट के बाद अदालत में पेश होना गिरफ्तारी नहीं, CrPC की धारा 170 का गलत अर्थ नहीं निकाला जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
Amir Ahmad
7 May 2026 12:31 PM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने जालसाजी के मामले में आरोपियों के खिलाफ जारी जमानती वारंट रद्द करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 170 के तहत आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने का अर्थ उसकी गिरफ्तारी या न्यायिक हिरासत नहीं होता।
जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की पीठ ने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने जांच के दौरान आरोपी को गिरफ्तार करना आवश्यक नहीं समझा, तो केवल चार्जशीट दाखिल होने के बाद औपचारिक रूप से जमानत विचार के लिए आरोपी को हिरासत में नहीं भेजा जा सकता।
अदालत ने कहा,
“CrPC की धारा 170 में प्रयुक्त 'कस्टडी' शब्द का अर्थ अनिवार्य रूप से पुलिस या न्यायिक हिरासत नहीं है बल्कि केवल आरोपी को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना है।”
मामला एक सोसायटी के संविधान में कथित जालसाजी और बैठक की कार्यवाही में हेरफेर से जुड़ी FIR से संबंधित था। जांच एजेंसी ने पूरे जांचकाल में आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया। यहां तक कि अदालत ने भी चालान पेश होने तक उन्हें संरक्षण दिया हुआ था।
जब पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की उस दिन आरोपी अदालत में उपस्थित नहीं हुए। इस पर ट्रायल कोर्ट ने उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिए और कहा कि उनकी जमानत पर विचार केवल उपस्थित होने के बाद किया जाएगा।
इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि जब जांच एजेंसी ने गिरफ्तारी आवश्यक नहीं समझी तब केवल चार्जशीट दाखिल होने के बाद उन्हें हिरासत में लेना अनुचित है।
वहीं सरकारी पक्ष ने कहा कि आरोपियों की अनुपस्थिति के कारण उन्हें जमानत आवेदन देना आवश्यक था और उस पर निर्णय अदालत के विवेक पर निर्भर करता है।
हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट का उद्देश्य केवल आरोपियों की उपस्थिति सुनिश्चित करना था जिसे समन जारी कर भी पूरा किया जा सकता था।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले सिद्धार्थ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए कहा कि CrPC की धारा 170 हर मामले में चार्जशीट दाखिल करते समय आरोपी की गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं बनाती।
पीठ ने कहा कि जमानती या गैर-जमानती वारंट जारी करने से पहले अदालत को तथ्यों का गंभीर परीक्षण और न्यायिक विवेक का प्रयोग करना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि वर्तमान मामले में आरोप गंभीर प्रकृति के नहीं थे, जांच पूरी हो चुकी थी, आरोपियों को कभी गिरफ्तार नहीं किया गया और ऐसा कोई संकेत नहीं है कि वे कानून की प्रक्रिया से बच रहे हैं या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करेंगे।
इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि केवल जमानत पर विचार करने के लिए आरोपियों को हिरासत में लेने का कोई औचित्य नहीं है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए आरोपियों के खिलाफ जारी जमानती वारंट रद्द किया।

