विभागीय जांच में सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से गवाहों से पूछताछ और क्रॉस-एग्जामिनेशन की जगह नहीं ली जा सकती: राजस्थान हाईकोर्ट

  • विभागीय जांच में सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड से गवाहों से पूछताछ और क्रॉस-एग्जामिनेशन की जगह नहीं ली जा सकती: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1958 ("नियम") के नियम 16(6)(a) के तहत गवाहों से पूछताछ, क्रॉस एग्जामिनेशन, बचाव पक्ष के सबूत या दलीलें सुनने जैसे चरणों को सिर्फ़ इसलिए नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि अनुशासनात्मक अधिकारियों को लगा कि दस्तावेज़ी या इलेक्ट्रॉनिक सामग्री ही काफ़ी है।

    जस्टिस कुलदीप माथुर की बेंच चित्तौड़गढ़ सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के एमडी के उस आदेश के ख़िलाफ़ अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसके तहत याचिकाकर्ता को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था।

    याचिकाकर्ता का कहना था कि जब वह बैंकिंग असिस्टेंट के तौर पर काम कर रहा था, तो उसे बैंक फंड के गबन के आरोपों वाला एक मेमोरेंडम (आरोप-पत्र) दिया गया।

    उसने इन सभी आरोपों से इनकार किया और कहा कि ट्रांज़ैक्शन के लिए ज़रूरी ID 'चेकर ID' थी, जो मैनेजर के पास थी, जबकि उसकी ID 'मेकर ID' थी। उसने यह भी कहा कि हो सकता है कि मैनेजर या किसी दूसरे कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी ने उसकी ID का गलत इस्तेमाल किया हो।

    याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बिना किसी विभागीय गवाह से पूछताछ किए ही उसे नौकरी से बर्खास्त करने का आदेश दे दिया गया। इसलिए नियमों के नियम 16 ​​में बताई गई ज़रूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जिससे उसे अपना बचाव करने का सही मौका नहीं मिला।

    इसके विपरीत, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता अपनी ID और पासवर्ड की गोपनीयता बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार था, और जिन ट्रांज़ैक्शन से गबन हुआ, वे उसकी ID से ही किए गए।

    दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया,

    "...ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि अभियोजन पक्ष के गवाहों और दस्तावेज़ों के साथ नियम के मुताबिक व्यवहार किया गया; कि जांच में विभागीय गवाहों से पूछताछ की गई। याचिकाकर्ता को उनसे क्रॉस एग्जामिनेशन करने का मौका दिया गया; कि बचाव पक्ष के गवाहों और दस्तावेज़ों के साथ तय तरीके से व्यवहार किया गया; या कि याचिकाकर्ता को बचाव पक्ष के सबूत पेश करने और उसके बाद दलीलें रखने का मौका दिया गया।"

    कोर्ट ने प्रतिवादियों के इस तर्क को खारिज किया कि बैंकिंग ट्रांज़ैक्शन की प्रकृति को देखते हुए गवाहों से पूछताछ ज़रूरी नहीं थी। यह माना गया कि नियम 16 ​​के तहत ज़रूरी प्रक्रिया का पालन करने के बजाय इस तरह के तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

    आगे कहा गया,

    “यह नियम अनुशासनात्मक अधिकारियों को जांच, क्रॉस-एग्जामिनेशन, बचाव में सबूत या दलीलें सुनने के चरणों को छोड़ने की इजाज़त नहीं देता, सिर्फ़ इसलिए कि विभाग दस्तावेज़ी या इलेक्ट्रॉनिक सामग्री को काफ़ी मानता है। जब आरोपों से इनकार किया जाता है तो नियम में बताई गई प्रक्रिया का पालन करना ज़रूरी होता है।”

    इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मौजूदा मामले में, याचिकाकर्ता का बचाव सिर्फ़ आरोपों से इनकार करना नहीं है, बल्कि एक तथ्यात्मक विवाद है कि उसकी ID एक 'मेकर ID' है, जबकि ट्रांज़ैक्शन के लिए 'चेकर ID' की ज़रूरत है, जो सिर्फ़ मैनेजर के पास होती है; यह प्रतिवादियों के उस तर्क के विपरीत है कि ट्रांज़ैक्शन याचिकाकर्ता की ID का इस्तेमाल करके किए गए।

    इस पृष्ठभूमि में यह माना गया कि ऐसे विवादित तथ्यात्मक मुद्दे को सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या अन्य आंतरिक सामग्री का हवाला देकर निर्णायक रूप से हल नहीं किया जा सकता।

    इसके अनुसार, याचिका मंज़ूर की गई और अनुशासनात्मक अधिकारी का वह आदेश रद्द किया गया, जिसमें याचिकाकर्ता की सेवाएँ समाप्त की गईं, क्योंकि नियम 16 ​​के तहत बताई गई प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

    Case Title : Vedprakash v Chittorgarh Central Coop. Bank Ltd. & Anr

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