प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वैध अनुमति के बिना कोर्ट 'जल अधिनियम' के तहत अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

Shahadat

3 Jun 2026 9:07 AM IST

  • प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वैध अनुमति के बिना कोर्ट जल अधिनियम के तहत अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या बोर्ड द्वारा अधिकृत किसी सक्षम अधिकारी की ओर से 'जल अधिनियम' की धारा 49 के तहत शिकायतकर्ता के पक्ष में वैध अनुमति न होने पर कोई भी आपराधिक कोर्ट इस अधिनियम के तहत किसी अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता।

    अधिनियम की धारा 49 के अनुसार, कोई भी कोर्ट इस अधिनियम के तहत किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं लेगा, जब तक कि शिकायत निम्नलिखित द्वारा न की गई हो: (क) प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या उसकी ओर से इस संबंध में अधिकृत कोई अधिकारी; या

    (ख) कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसने, निर्धारित तरीके से, कथित अपराध और शिकायत करने के अपने इरादे के बारे में बोर्ड या ऊपर बताए गए अधिकृत अधिकारी को कम से कम साठ दिन पहले नोटिस दिया हो। इसके अलावा, मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट से निचले स्तर का कोई भी कोर्ट इस अधिनियम के तहत दंडनीय किसी भी अपराध का विचारण (Trial) नहीं करेगा।

    हाईकोर्ट शिकायतकर्ता द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। यह याचिका रिवीजन कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ थी, जिसने 'जल अधिनियम' के तहत दायर मामले में मजिस्ट्रेट द्वारा लिए गए संज्ञान को रद्द कर दिया था और मामला वापस मजिस्ट्रेट के पास भेज दिया था।

    जस्टिस फरजंद अली की पीठ ने यह टिप्पणी की कि जब संज्ञान लेने वाला आदेश रद्द कर दिया गया तो मजिस्ट्रेट के लिए यह उचित होगा कि वह सेशन जज (रिवीजन कोर्ट) द्वारा दिए गए निर्देशों के आलोक में अपने ही आदेश पर पुनर्विचार करे।

    कोर्ट ने आगे निर्देश दिया:

    "इस कोर्ट द्वारा एक और निर्देश दिया जा सकता है कि मामले में आगे बढ़ने से पहले शिकायतकर्ता की आपराधिक शिकायत दर्ज करने की योग्यता और अधिकार की पहले जांच की जाए। धारा 49 का पालन, जो अनिवार्य प्रकृति का है, उसका भी ध्यान रखा जाएगा।

    कोर्ट ने कहा कि उसके सामने रखे गए "प्रथम दृष्टया सबूतों" के अनुसार, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या बोर्ड द्वारा इस संबंध में अधिकृत किसी भी अधिकारी की ओर से किसी भी अधिकार-पत्र (Authorization) का अभाव दिखाई देता है। इसलिए कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट इस बात पर विचार करेंगे कि आपराधिक शिकायत दर्ज करने से पहले क्या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इस संबंध में उनके सामने शिकायत दर्ज करने के उद्देश्य से कोई अधिकार-पत्र जारी किया गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि शिकायतकर्ता के पक्ष में वैध अधिकार-पत्र के अभाव में आपराधिक कोर्ट 'जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1957' के प्रावधानों के तहत अपराध का संज्ञान लेने में असमर्थ होता है।"

    इसलिए उसने निर्देश दिया:

    “उपर्युक्त चर्चा और 'जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974' की धारा 49 में निहित स्पष्ट निर्देश के आलोक में माननीय मजिस्ट्रेट मामले में आगे बढ़ने से पहले शिकायत दर्ज करने के लिए शिकायतकर्ता की योग्यता और वैध अधिकार के संबंध में सबसे पहले एक विशिष्ट निष्कर्ष दर्ज करेंगे।”

    कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि शिकायत दर्ज करते समय शिकायतकर्ता के पक्ष में एक वैध और कानूनी रूप से मान्य अधिकार-पत्र के अभाव में, धारा 49 के तहत रोक (bar) लागू हो जाएगी। इससे शिकायत सुनवाई योग्य नहीं रह जाएगी और आपराधिक कोर्ट को अपराध का संज्ञान लेने से रोक देगी।

    तदनुसार, याचिका का निपटारा किया गया।

    Title: Pramod Jain v the Regional Officer, Rajasthan State Pollution Control Board & Anr.

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