दोषी द्वारा मुकदमे का खर्च न चुका पाने पर प्रोबेशन रद्द करके उसे जेल नहीं भेजा जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
Shahadat
22 Oct 2026 10:19 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दोषी द्वारा मुकदमे का खर्च (प्रॉसिक्यूशन कॉस्ट) न चुका पाना, अपने आप में प्रोबेशन का लाभ रद्द करने और उसे जेल भेजने का आधार नहीं हो सकता।
जस्टिस फरजंद अली एक दोषी की अपील पर सुनवाई कर रहे थे। इस दोषी को 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958' की धारा 4 के तहत प्रोबेशन का लाभ दिया गया, भले ही उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपराधों का दोषी ठहराया गया था। ट्रायल कोर्ट ने उसे इस एक्ट की धारा 5 के तहत मुकदमे की कार्यवाही के खर्च के रूप में ₹10,000 जमा करने का निर्देश भी दिया।
चूंकि अपनी खराब आर्थिक स्थिति के कारण अपीलकर्ता यह रकम नहीं चुका सका, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने इसे प्रोबेशन की शर्तों का उल्लंघन माना, प्रोबेशन का लाभ वापस ले लिया और उसे जेल की सजा सुना दी। इस आदेश को चुनौती देते हुए अपीलकर्ता हाईकोर्ट पहुंचा। अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसे केवल इसलिए जेल भेजा गया, क्योंकि वह अपनी बेहद खराब आर्थिक स्थिति के कारण रकम जमा नहीं कर सका।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि प्रोबेशन की शर्तों के जानबूझकर किए गए उल्लंघन और किसी आर्थिक निर्देश का पालन न कर पाने (असमर्थता) के बीच फर्क करना जरूरी है।
जहां जानबूझकर किए गए उल्लंघन के मामले में एक्ट की धारा 9 के तहत कार्रवाई हो सकती है, वहीं रकम न चुका पाने की असमर्थता को अपने आप में 'जानबूझकर किया गया उल्लंघन' नहीं माना जा सकता। इसलिए एक बार प्रोबेशन का लाभ मिल जाने के बाद, उसे सिर्फ इसलिए वापस नहीं लिया जा सकता क्योंकि अपीलकर्ता वह रकम जुटाने में असमर्थ रहा।
अदालत ने कहा,
"ऐसा होने पर प्रोबेशन का लाभ अपराधी की आर्थिक क्षमता पर निर्भर हो जाएगा। इस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे पता चले कि अपीलकर्ता ने जानबूझकर आर्थिक निर्देश का पालन नहीं किया या उसने प्रोबेशन की शर्तों का उल्लंघन किया। ₹10,000 की रकम न जुटा पाने के कारण ही उसे जेल हुई है। इन हालात में कोर्ट की राय में केवल मुकदमे का खर्च न चुका पाने को पहले से दिए गए प्रोबेशन के लाभ को वापस लेने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।"
अदालत ने आगे कहा कि धारा 5 के तहत पीड़ित के मुआवजे के लिए तय की गई राशि, मुकदमे के खर्च के लिए निर्धारित बाकी राशि से अलग थी। इसलिए मुकदमे के खर्च की राशि जमा करने में असमर्थ होने के कारण अपीलकर्ता को जेल भेजने जैसा गंभीर परिणाम नहीं दिया जा सकता।
इसके अनुसार, ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया गया, मौद्रिक शर्त को हटाने का निर्देश दिया गया और अपीलकर्ता को रिहा करने का आदेश दिया गया।
Case Title : Sanjay alias Sethi v State of Rajasthan

