सोना तस्करी मामले में हाईकोर्ट ने दिया थाई महिला का पासपोर्ट जारी करने का आदेश दिया, कहा- अनुच्छेद 21 के तहत सुरक्षा विदेशी नागरिकों पर भी लागू होती है
Shahadat
27 May 2026 11:03 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने थाई नागरिक का पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया, जिस पर बार-बार सोने की तस्करी करने का आरोप है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी अनुमति न देना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसके मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की बेंच ने आगे कहा कि आरोपी के अपने देश भाग जाने की आशंका को दूर करने के लिए पर्याप्त कानूनी सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, जो 'इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स ऑर्डर, 2025' के रूप में उपलब्ध हैं।
कोर्ट ने कहा,
"भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाली सुरक्षा, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देती है, सभी व्यक्तियों पर लागू होती है। यह अधिकार केवल भारतीय नागरिकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विदेशी नागरिकों के लिए भी उपलब्ध है। अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन का जो अधिकार दिया गया, वह विदेशियों सहित सभी मनुष्यों के लिए उपलब्ध है।"
बता दें, कोर्ट एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें याचिकाकर्ता के पासपोर्ट को जारी करने की मांग वाली अर्जी को खारिज किए जाने को चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता थाईलैंड की नागरिक थी, जो 'केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सीमा शुल्क अधिनियम, 1962' के तहत सोने की तस्करी के एक मामले में सह-आरोपी थी। गिरफ्तारी के बाद उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया गया, जिसकी वैधता जनवरी 2025 में समाप्त हो गई।
याचिकाकर्ता जमानत पर थी और उसने अपना पासपोर्ट जारी करने के लिए अर्जी दी थी ताकि वह उसे रिन्यू करवा सके। इस अर्जी को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा लंबित है। इस आशंका के चलते कि वह देश छोड़कर भाग जाएगी और वापस नहीं लौटेगी। याचिकाकर्ता ने कोर्ट में इस आदेश को चुनौती दी थी।
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि वह एक आदतन अपराधी है, जो पहले भी 4 बार सोने की तस्करी के उद्देश्य से भारत आ चुकी है; यह बात उसने खुद भी स्वीकार की है। इसके अलावा, यह भी कहा गया कि उसने पहले भी अपनी ज़मानत का गलत इस्तेमाल किया था, क्योंकि वह कोर्ट के सामने पेश नहीं हुई; जिसके बाद उसकी ज़मानत ज़ब्त की गई और वह मई 2026 तक फ़रार रही।
दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत विदेश यात्रा के अधिकार पर ज़ोर देते हुए फ़ैसला दिया कि पासपोर्ट बहुत ज़रूरी दस्तावेज़ है, जो किसी व्यक्ति को अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ पार करने और किसी विदेशी क्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति देता है।
कोर्ट ने कहा,
“नतीजतन, एक वैध पासपोर्ट न होने पर कोई नागरिक किसी विदेशी देश की नज़र में एक अजनबी बन जाता है, जिसके पास उस देश के क्षेत्र में प्रवेश करने या वहां रहने का कोई कानूनी अधिकार नहीं होता। इसलिए किसी व्यक्ति के पासपोर्ट को मनमाने ढंग से या गैर-कानूनी तरीके से देने से मना करना, भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिक के विदेश यात्रा के मौलिक अधिकार से वंचित करने जैसा है।”
इस पृष्ठभूमि में, कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि किसी आपराधिक मामले का लंबित होना, याचिकाकर्ता को पासपोर्ट सुविधाएं—जिसमें उसका नवीनीकरण भी शामिल है—देने से मना करने का आधार नहीं हो सकता। ऐसी अनुमति देने से मना करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन माना जाएगा।
याचिकाकर्ता के फ़रार होने की आशंका के संबंध में कोर्ट ने 'इमिग्रेशन एंड फ़ॉरेनर्स ऑर्डर, 2025' के आदेश/खंड 5 का ज़िक्र किया, जो विदेशी नागरिकों को भारत से बाहर जाने की अनुमति देने के मामले को नियंत्रित करता है।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह प्रावधान इस तथ्य के बारे में बिल्कुल स्पष्ट है कि किसी भी विदेशी नागरिक को भारत से बाहर जाने की अनुमति देने या न देने का विवेकाधिकार (Discretion) इमिग्रेशन अधिकारी के पास होता है।
इसलिए याचिका स्वीकार की गई और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ता का पासपोर्ट उसके नवीनीकरण के लिए जारी कर दे।
तदनुसार, संबंधित राज्य अधिकारियों को भी निर्देश दिया गया कि वे उचित कदम उठाने के लिए इस आदेश की जानकारी इमिग्रेशन अधिकारी तक पहुंचाएं।
Title: Saisuda Chuennok v Union of India

