गैर-कानूनी हिरासत और ड्यूटी से हटकर मारपीट के मामले में पुलिस कॉन्स्टेबल पर केस चलाने के लिए मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट
Shahadat
3 Sept 2026 10:03 AM IST

राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और रिविज़नल कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए कहा कि अपील करने वाले पुलिस अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने के लिए CrPC की धारा 197 के तहत मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं थी। उस अधिकारी पर आरोप था कि उसने प्रतिवादी (Respondent) को तब बुरी तरह पीटा था जब वह कथित तौर पर गैर-कानूनी हिरासत में था।
जस्टिस रवि चिरानिया की बेंच ने माना कि याचिकाकर्ता का काम उसकी आधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा नहीं कहा जा सकता, बल्कि उसने अपनी ड्यूटी की सीमा से बाहर जाकर काम किया।
बता दें, प्रतिवादी एक सोशल वर्कर था, जिसे पुलिस ने कथित तौर पर ज़बरदस्ती उठाया, गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा और प्रताड़ित किया। गैर-कानूनी हिरासत के खिलाफ़ सार्वजनिक विरोध-प्रदर्शन हुआ। विरोध के दौरान, याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी को सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट की कोर्ट के अंदर बंद कर दिया और लाठी से मारपीट की।
इसके बाद गैर-कानूनी हिरासत और कस्टडी में हिंसा के मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ़ FIR दर्ज की गई।
पुलिस ने इस मामले में नेगेटिव रिपोर्ट दाखिल की थी। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने मामले का संज्ञान (Cognizance) लिया। इस फैसले को रिविज़नल कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसने भी संज्ञान लेने के फैसले को सही ठहराया। इसलिए दोनों आदेशों के खिलाफ़ कोर्ट में अपील की गई।
याचिकाकर्ता ने CrPC की धारा 197 का हवाला देते हुए तर्क दिया कि उसके खिलाफ़ मुकदमा चलाने की मंज़ूरी के बिना, उसकी आधिकारिक ड्यूटी के दौरान किए गए कामों के लिए मामले में संज्ञान नहीं लिया जा सकता।
यह दलील दी गई कि वह घटना वाली जगह पर तैनात था और अन्य पुलिसकर्मियों के साथ अपनी ड्यूटी कर रहा था। हालांकि, उसे व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाया गया और पूरी घटना के लिए बलि का बकरा बनाया गया।
तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने सुनीति टोटेजा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया।
इसमें यह कहा गया,
“धारा 197 को लागू करने के लिए यह ज़रूरी है कि सरकारी कर्मचारी पर किसी ऐसे अपराध का आरोप हो जो उसने अपनी 'सरकारी ड्यूटी निभाते हुए' किया हो। इस बात से साफ़ पता चलता है कि CrPC की धारा 197 ऐसे मामले में लागू नहीं होगी, जहां किसी सरकारी कर्मचारी पर ऐसे अपराध का आरोप हो जो उसकी सरकारी ड्यूटी निभाने से अलग या उससे जुड़ा न हो।”
कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता का रेस्पॉन्डेंट को कोर्ट के अंदर बंद करके बुरी तरह पीटने का काम, एक पुलिस कॉन्स्टेबल के तौर पर उसकी सरकारी ड्यूटी निभाने के दौरान किया गया काम नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने यह भी बताया कि शिकायत सिर्फ़ याचिकाकर्ता के ख़िलाफ़ दर्ज की गई, न कि किसी और पुलिसकर्मी के ख़िलाफ़, जिससे यह साफ़ हो गया कि सिर्फ़ याचिकाकर्ता ने ही अपनी सरकारी ड्यूटी से हटकर काम किया।
इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने माना कि इस मामले में प्रॉसिक्यूशन की मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट या रिविज़नल कोर्ट के आदेशों में कोई कमी नहीं थी।
इसके अनुसार, याचिका खारिज कर दी गई।
Title: Vinod Kumar v State of Rajasthan & Anr.


