लापता बच्चों की बरामदगी के लिए समान एसओपी बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

21 Jan 2026 10:49 PM IST

  • लापता बच्चों की बरामदगी के लिए समान एसओपी बनाने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट

    देशभर में लापता बच्चों की बढ़ती समस्या पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में संकेत दिया है कि वह लापता बच्चों की बरामदगी के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SoP) तैयार करने की दिशा में कदम उठाएगा।

    यह टिप्पणी जस्टिस अहसनुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें तमिलनाडु में वर्ष 2011 में लापता हुई एक बच्ची (उस समय आयु 1 वर्ष 10 माह) की बरामदगी से जुड़ा प्रश्न था। 16 जनवरी को हुई सुनवाई में अदालत ने यह भी कहा कि तमिलनाडु सरकार अब जाकर इस मामले में सक्रिय हुई है।

    अदालत ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि देशभर में इस प्रकार की घटनाएं व्यापक रूप से सामने आ रही हैं, इसके बावजूद राज्य सरकारें ऐसे मामलों को न तो उचित गंभीरता से ले रही हैं और न ही इन्हें प्राथमिकता दी जा रही है।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा—

    “अदालत का प्रयास एक ऐसी समान मानक संचालन प्रक्रिया विकसित करने का होगा, जिसे लागू किया जाना अनिवार्य है। ऐसे मामलों में समय सबसे महत्वपूर्ण तत्व होता है और यदि लापता बच्चों की वास्तविक रूप से बरामदगी की कोई संभावना होती है, तो वह प्रारंभिक समय में ही होती है।”

    इसी को ध्यान में रखते हुए अदालत ने केंद्रीय गृह सचिव के माध्यम से भारत संघ तथा सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को उनके संबंधित गृह सचिवों के माध्यम से इस मामले में पक्षकार बनाए जाने का निर्देश दिया।

    मामले की पृष्ठभूमि

    याचिकाकर्ता, जो बच्ची का पिता है, ने बताया कि बच्ची के लापता होने के बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस ने उसे खोजने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया और अंततः मजिस्ट्रेट के समक्ष क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल कर दी।

    इसके बाद याचिकाकर्ता ने हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की, जिस पर मद्रास हाईकोर्ट ने सेंट्रल क्राइम ब्रांच को जांच सौंपने का निर्देश दिया। हालांकि, जांच एजेंसी ने भी रिपोर्ट दाखिल कर बच्ची को “अनट्रेसेबल/अनडिटेक्टेबल” बताया।

    फिर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की गई, जिस पर चेन्नई पुलिस आयुक्त को एक विशेष जांच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया गया। SIT ने भी यही निष्कर्ष निकाला कि बच्ची का कोई पता नहीं चल सका। इसके बाद मामला मजिस्ट्रेट के समक्ष बंद कर दिया गया।

    इस आदेश के खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट में रिवीजन पिटीशन दाखिल की गई, जिसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि मामले में सभी संभव प्रयास किए जा चुके हैं।

    2013 के गृह मंत्रालय के सर्कुलर का मुद्दा

    याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा 2013 में जारी सर्कुलर के अनुसार, यदि कोई बच्चा चार महीने के भीतर बरामद नहीं होता है, तो मामला संबंधित राज्य की एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को भेजा जाना चाहिए।

    हालांकि, हाई कोर्ट ने यह कहते हुए इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि बच्ची वर्ष 2011 में लापता हुई थी, जबकि सर्कुलर 2013 में जारी हुआ, इसलिए वह इस मामले पर लागू नहीं होता। इसी आदेश के खिलाफ वर्तमान विशेष अनुमति याचिका (SLP) सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई।

    सुप्रीम कोर्ट में लापता बच्चों और बाल तस्करी से जुड़े अन्य मामले

    गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की कई पीठें देश में लापता बच्चों और संगठित बाल तस्करी से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही हैं।

    जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ एक जनहित याचिका गुरिया स्वयं सेवी संस्थान बनाम भारत संघ की सुनवाई कर रही है, जो खोया-पाया पोर्टल पर दर्ज लापता बच्चों के अनसुलझे मामलों और बाल तस्करी से संबंधित है।

    अदालत ने कहा है कि ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती तस्करी नेटवर्क का अंतर-राज्यीय और व्यापक स्वरूप है। कोर्ट ने भारत संघ को निर्देश दिया है कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश लापता बच्चों और तस्करी से जुड़े मामलों के लिए नियुक्त नोडल अधिकारियों का विवरण उपलब्ध कराएं और उसे मिशन वात्सल्य पोर्टल पर अपलोड करें।

    जमानत मामलों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती

    इसके अतिरिक्त, जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की एक अन्य खंडपीठ पिंकी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में आपराधिक अपीलों की सुनवाई कर रही है, जो Allahabad High Court द्वारा बाल तस्करी मामलों में दी गई जमानत से संबंधित हैं।

    इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर जमानत रद्द की है और राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे ऐसे गंभीर मामलों में जमानत रद्द कराने के लिए सतर्कता से कार्रवाई करें।

    सामान्य निर्देश

    वर्तमान मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कुछ सामान्य निर्देश जारी किए हैं, जिनमें शामिल हैं—

    बाल तस्करी और लापता बच्चों से जुड़े मामलों की शीघ्र सुनवाई,

    ऐसे मामलों में छह महीने के भीतर ट्रायल पूरा करना,

    तथा देशभर के उच्च न्यायालयों से बाल तस्करी मामलों में लंबित ट्रायल का आंकड़ा उपलब्ध कराने का निर्देश।

    अदालत के इन अवलोकनों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि लापता बच्चों और बाल तस्करी के मामलों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट अब राष्ट्रीय स्तर पर एक समान, प्रभावी और समयबद्ध तंत्र विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

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