कंटेंट ब्लॉक करने के लिए सरकार द्वारा मध्यस्थ को भेजे गए नोटिस की कॉपी सोशल मीडिया यूजर को दी जानी चाहिए: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

  • कंटेंट ब्लॉक करने के लिए सरकार द्वारा मध्यस्थ को भेजे गए नोटिस की कॉपी सोशल मीडिया यूजर को दी जानी चाहिए: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि जिस सोशल मीडिया यूजर का कंटेंट ब्लॉक किया जा रहा है, उसे सरकार द्वारा मध्यस्थ (इंटरमीडियरी) को भेजे गए नोटिस की कॉपी तुरंत मिलनी चाहिए। कोर्ट ने माना कि 'प्राकृतिक न्याय' (नेचुरल जस्टिस) के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित करने के लिए ऐसी जानकारी देना जरूरी है।

    जस्टिस त्रिभुवन दहिया ने कहा कि भले ही 'सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021' में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि IT Act की धारा 79(3)(b) के तहत मध्यस्थ को नोटिस भेजने से पहले सरकार प्रभावित यूजर को सूचित करे, लेकिन 'प्राकृतिक न्याय' के सिद्धांतों के तहत यह जरूरी है कि उस नोटिस की एक कॉपी यूजर को दी जाए।

    कोर्ट ने कहा,

    "इसलिए जब मध्यस्थ को नोटिस भेजा जाए तो उसकी एक कॉपी यूजर को भी दी जानी चाहिए।"

    कोर्ट 'हरियाणा 24 न्यूज़ नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड' द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कंपनी ने भारत में अपने फेसबुक पेज को ब्लॉक किए जाने को चुनौती दी। यह कार्रवाई हरियाणा पुलिस द्वारा IT Act की धारा 79(3)(b) के तहत 'मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक' (Meta Platforms Inc.) को भेजे गए एक नोटिस के आधार पर की गई।

    याचिकाकर्ता का फेसबुक पेज 21 अगस्त, 2026 को ब्लॉक कर दिया गया। कंपनी का तर्क था कि न तो उन्हें पहले कोई नोटिस दिया गया और न ही 'मेटा' को भेजे गए नोटिस की कोई कॉपी दी गई, जिससे उन्हें यह पता ही नहीं चला कि उनके पेज को क्यों ब्लॉक किया गया और इसके पीछे क्या आधार था।

    राज्य सरकार ने बताया कि कंपनी के निदेशकों में से एक व्यक्ति आपराधिक मामले में आरोपी है। आरोप है कि वह फेसबुक पेज के जरिए वीडियो पोस्ट कर रहा था और संदेश भेज रहा था, ताकि पीड़ित और गवाहों को डराया-धमकाया जा सके। इसी वजह से यमुनानगर के पुलिस अधीक्षक (SP) ने 'मेटा' को नोटिस भेजकर उस पेज तक पहुंच (एक्सेस) बंद करने का निर्देश दिया था।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि यह नोटिस पुलिस अधीक्षक (SP) द्वारा जारी किया गया, जो 2021 के नियमों के तहत ऐसे निर्देश जारी करने के लिए अधिकृत पुलिस अधिकारी के पद (रैंक) से नीचे के अधिकारी हैं। नियमों के अनुसार, पुलिस प्रशासन की ओर से ऐसी सूचना जारी करने के लिए पुलिस उप महानिरीक्षक (DIG) या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी का होना ज़रूरी है, जिसे संबंधित सरकार द्वारा विशेष रूप से अधिकृत किया गया हो।

    अदालत ने माना कि जब कानूनी नियमों में अधिकृत अधिकारी के न्यूनतम रैंक का स्पष्ट उल्लेख है तो इस अधिकार को किसी निचले रैंक के अधिकारी को नहीं सौंपा जा सकता। नतीजतन, अदालत ने कहा कि यह सूचना अधिकार क्षेत्र से बाहर (बिना अधिकार के) जारी की गई।

    शिकायत निवारण के अधिकार के लिए 'ब्लॉकिंग' की कार्रवाई की जानकारी होना ज़रूरी

    हाईकोर्ट ने राज्य के इस तर्क को भी खारिज किया कि याचिकाकर्ता को अपना फेसबुक पेज बहाल कराने के लिए मेटा (Meta) की शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal Mechanism) से संपर्क करना चाहिए।

    अदालत ने गौर किया कि 2021 के नियमों का नियम 3(2) उपयोगकर्ताओं के लिए एक शिकायत निवारण प्रणाली प्रदान करता है। हालाँकि, 'ब्लॉकिंग' की कार्रवाई को चुनौती देने का प्रभावी मौका तभी मिल सकता है, जब प्रभावित उपयोगकर्ता को यह पता हो कि किस आधार पर यह कार्रवाई की गई।

    अदालत ने कहा कि मध्यस्थ (Intermediary) के शिकायत अधिकारी के समक्ष किसी भी 'निर्णय-पश्चात सुनवाई' (Post-Decisional Hearing) के लिए यह ज़रूरी है कि यूजर्स को उस सूचना, उसकी सामग्री और उसे जारी करने के लिए इस्तेमाल की गई सामग्री के बारे में पता हो। ऐसी जानकारी के बिना यूजर्स अपना बचाव नहीं कर पाएगा, जिससे शिकायत निवारण प्रणाली का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।

    अदालत ने कहा,

    "कानून द्वारा स्थापित हर प्रक्रिया निष्पक्ष और उचित होनी चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है, जब वह 'प्राकृतिक न्याय' (Natural Justice) के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन न करे, जिसमें निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार भी शामिल है।"

    'मध्यमम ब्रॉडकास्टिंग लिमिटेड बनाम भारत संघ (2023)' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार और पक्षपात-मुक्त होने का अधिकार, प्राकृतिक न्याय के मुख्य सिद्धांत हैं।

    अदालत ने माना कि भले ही नियम 3(2) में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि मध्यस्थ को सूचना भेजने से पहले सरकार को प्रभावित उपयोगकर्ता को सूचित करना होगा, लेकिन इस नियम का अर्थ यही निकलता है कि उपयोगकर्ता को उस सूचना की प्रति उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

    इस मामले में याचिकाकर्ता को न तो पुलिस से और न ही मेटा से इस सूचना की कोई प्रति मिली थी, और उसे पेज ब्लॉक किए जाने की प्रक्रिया के बारे में पूरी तरह से अंधेरे में रखा गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में याचिकाकर्ता को मध्यस्थ (इंटरमीडियरी) की शिकायत निवारण प्रणाली के पास भेजना व्यर्थ होगा और इससे उसके अपना बचाव करने के अधिकार पर गंभीर असर पड़ेगा।

    फेसबुक पेज बहाल किया जाएगा

    हाईकोर्ट ने यमुनानगर के पुलिस अधीक्षक द्वारा 21 अगस्त, 2026 को जारी की गई सूचना रद्द की। साथ ही अधिकारी को निर्देश दिया कि वे मेटा से कहें कि आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 24 घंटे के भीतर याचिकाकर्ता के फेसबुक पेज को उसकी मूल स्थिति में बहाल कर दिया जाए।

    कोर्ट ने आगे निर्देश दिया कि यदि सरकार को पता चलता है कि याचिकाकर्ता के फेसबुक पेज पर मौजूद कोई जानकारी या सामग्री कानून द्वारा प्रतिबंधित है और उसका इस्तेमाल अवैध गतिविधियों के लिए किया जा रहा है तो अधिकृत अधिकारी द्वारा मध्यस्थ को भेजी गई किसी भी सूचना की एक प्रति, भेजे जाने के तुरंत बाद याचिकाकर्ता को भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

    इसके साथ ही याचिका का निपटारा किया गया।

    Case Title : HARYANA 24 NEWS NETWORK PRIVATE LIMITED Versus UNION OF INDIA AND OTHERS

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story