पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने सहकारी समितियों के कर्मचारियों के लिए सरकारी कर्मचारियों के बराबर रिटायरमेंट लाभ अनिवार्य करने वाला 1997 का नियम रद्द किया

Shahadat

3 April 2026 7:55 PM IST

  • पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने सहकारी समितियों के कर्मचारियों के लिए सरकारी कर्मचारियों के बराबर रिटायरमेंट लाभ अनिवार्य करने वाला 1997 का नियम रद्द किया

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि 1997 के सेवा नियम, जो सहकारी समितियों के कर्मचारियों के लिए सरकारी कर्मचारियों के बराबर रिटायरमेंट लाभ अनिवार्य करते हैं, मूल कानून के अधिकार क्षेत्र से बाहर (ultra vires) हैं और उन्हें लागू नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार के पास अपनी नियम बनाने की शक्ति को आगे रजिस्ट्रार को सौंपने का कोई अधिकार नहीं था। इस तरह का उप-प्रतिनिधित्व (Sub-Delegation) न तो स्पष्ट रूप से और न ही संबंधित अधिनियम के तहत निहित रूप से अनुमत था।

    जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ सहकारी समितियों के रिटायर्ड कर्मचारियों द्वारा दायर रिट याचिकाओं के एक समूह की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उन्होंने ब्याज सहित रिटायरमेंट लाभ जारी करने की मांग की थी; साथ ही वे एक सहकारी समिति द्वारा दायर उस याचिका की भी सुनवाई कर रहे थे, जिसमें ऐसे लाभ जारी करने के निर्देशों को चुनौती दी गई।

    कर्मचारियों ने तर्क दिया कि 'पंजाब राज्य सहकारी कृषि सेवा समितियां सेवा नियम, 1997' के तहत वे पंजाब सरकार के कर्मचारियों के बराबर ग्रेच्युटी, अवकाश नकदीकरण (Leave Encashment) और अन्य रिटायरमेंट लाभों के हकदार थे; जबकि समितियों ने वित्तीय अक्षमता और कुछ मामलों में लंबित वसूली का हवाला देते हुए ऐसे दावों का विरोध किया।

    कोर्ट ने 'पंजाब सहकारी समितियां अधिनियम, 1961' के तहत वैधानिक ढांचे की जांच की, जो धारा 85 के तहत नियम बनाने की शक्ति राज्य सरकार को प्रदान करता है। कोर्ट ने पाया कि यद्यपि राज्य सरकार ने 1963 के नियम बनाए, लेकिन बाद में उसने नियम 28 के माध्यम से अपनी शक्ति रजिस्ट्रार को सौंप दी; जिसके परिणामस्वरूप रजिस्ट्रार ने 1997 के सेवा नियम बनाए, जो सहकारी समितियों के कर्मचारियों की सेवा शर्तों को नियंत्रित करते हैं।

    विचार-विमर्श के बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया कि मूल अधिनियम राज्य सरकार को अपनी नियम बनाने की शक्ति को आगे सौंपने का अधिकार नहीं देता है। इसलिए रजिस्ट्रार को दिया गया यह अधिकार-हस्तांतरण (Delegation) अस्वीकार्य था। परिणामस्वरूप, रजिस्ट्रार द्वारा बनाए गए 1997 के सेवा नियमों को अधिनियम के दायरे से बाहर माना गया।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    "...राज्य सरकार 1961 के अधिनियम की धारा 85(2)(xxxviii) के तहत अपनी नियम बनाने की शक्ति को सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार को नहीं सौंप सकती थी। इस तरह का उप-प्रतिनिधित्व मूल अधिनियम के तहत न तो स्पष्ट रूप से अधिकृत है और न ही आवश्यक निहितार्थ द्वारा अनुमत है। अतः, यह कोर्ट फैसला सुनाता है कि 1997 के सेवा नियम 1961 के अधिनियम के अधिकार क्षेत्र से बाहर (ultra vires) हैं।"

    अदालत ने आगे यह भी कहा कि सहकारी समितियां स्वतंत्र संस्थाएं हैं, जिनका प्रबंधन चुनी हुई समितियाँ करती हैं और जो राज्य से बिना किसी वित्तीय सहायता के अपने ही संसाधनों से काम करती हैं। अदालत ने पाया कि ऐसी कई समितियां आर्थिक संकट में हैं, उनके आय के स्रोत सीमित हैं और उन पर भारी संचित घाटा है। ऐसे में राज्य से बिना किसी वित्तीय मदद के उन पर सरकारी कर्मचारियों के बराबर ही सेवानिवृत्ति लाभ देने की बाध्यता डालना अव्यावहारिक होगा।

    तदनुसार, अदालत ने यह फैसला सुनाया कि 1997 के सेवा नियम, 1961 के अधिनियम के अधिकार-क्षेत्र से बाहर (Ultra Vires) हैं और उन्हें लागू नहीं किया जा सकता। परिणामस्वरूप, कर्मचारियों द्वारा सेवानिवृत्ति लाभों की मांग करते हुए दायर की गई रिट याचिकाओं को, सुनवाई योग्य न मानते हुए खारिज कर दिया गया। सहकारी समिति द्वारा दायर याचिका स्वीकार की गई; सेवानिवृत्ति लाभ जारी करने का निर्देश देने वाले 'कारण बताओ नोटिस' (Show Cause Notice) रद्द किया गया। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि रिटायर्ड कर्मचारियों को पहले से ही दिए जा चुके लाभों के संबंध में उनसे किसी भी प्रकार की वसूली नहीं की जाएगी।

    Case Title: Samarjit Singh vs. State of Punjab & Ors. and connected matters [CWP-1422-2026 and connected cases]

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