विस्तृत आदेश से पहली जमानत याचिका खारिज होने के बाद केवल लंबी हिरासत आधार नहीं बन सकती — पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

Praveen Mishra

5 Jan 2026 6:12 PM IST

  • विस्तृत आदेश से पहली जमानत याचिका खारिज होने के बाद केवल लंबी हिरासत आधार नहीं बन सकती — पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने आदर्श ग्रुप ऑफ कंपनियों से जुड़े एसएफआईओ (SFIO) जांच मामले में आरोपी द्वारा दायर दूसरी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्रमिक/दूसरी जमानत याचिका स्वतः ही अवैध नहीं होती, लेकिन केवल लम्बी अवधि की हिरासत को आधार बनाकर जमानत नहीं दी जा सकती, जब तक कि परिस्थितियों में कोई ठोस और महत्वपूर्ण बदलाव न दिखाया जाए।

    जस्टिस मनिषा बत्रा ने कहा —

    “यद्यपि दूसरी या क्रमिक नियमित जमानत याचिका केवल अनुरक्षण (maintainability) के आधार पर खारिज नहीं की जा सकती, लेकिन ऐसी याचिका को सफल होने के लिए याचिकाकर्ता को परिस्थितियों में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाना आवश्यक है। मात्र लम्बी हिरासत के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती, विशेषकर तब, जब पूर्व याचिका को विस्तृत आदेश के साथ खारिज किया जा चुका हो और वह आदेश सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी बरकरार रखा गया हो।”

    यह याचिका SFIO बनाम आदर्श बिल्ड एस्टेट एंड अदर्स शीर्षक आपराधिक शिकायत से संबंधित थी, जो गुरुग्राम स्थित विशेष अदालत में लंबित है। शिकायत कंपनियों अधिनियम, 2013 एवं 1956 तथा भारतीय दंड संहिता के विभिन्न प्रावधानों, विशेषकर धारा 447 (धोखाधड़ी) के तहत दर्ज की गई है।

    मामला वर्ष 2018 में कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय द्वारा धारा 212 के तहत एसएफआईओ जांच के आदेश से उत्पन्न हुआ, जिसमें आदर्श ग्रुप और 125 एलएलपी के वित्तीय लेन–देन की जांच में आदर्श क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड के धन की बड़े पैमाने पर हेराफेरी का खुलासा हुआ, जिससे लगभग दो लाख जमाकर्ता प्रभावित हुए।

    याचिकाकर्ता को आरोपी के रूप में तलब किया गया और वह 22 जुलाई 2022 से न्यायिक हिरासत में है। आरोप है कि एक प्रोजेक्ट में 18% साझेदार एवं अधिकृत हस्ताक्षरी होने के नाते उसने लगभग ₹85 करोड़ की राशि का दुरुपयोग करते हुए गबन किया।

    याचिकाकर्ता ने दलील दी कि वह तीन वर्ष से अधिक समय से हिरासत में है, अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और इतने बड़े व जटिल ट्रायल के शीघ्र पूर्ण होने की संभावना नहीं है। इसलिए लम्बी कैद अनुच्छेद 21 के विरुद्ध है।

    वहीं, एसएफआईओ ने आपत्ति जताई कि पूर्व जमानत याचिका नवंबर 2023 में खारिज हो चुकी है, जिसे मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा, और तब से परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। साथ ही अपराध को गंभीर आर्थिक अपराध बताते हुए फरार होने की आशंका भी जताई गई।

    हाईकोर्ट ने माना कि धारा 212(6) के तहत कठोर शर्तें कुछ मामलों में ढीली की जा सकती हैं, परंतु यहाँ ऐसा कोई नया तथ्य या परिवर्तन प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि धारा 447 के अंतर्गत अपराध 10 वर्ष तक की सजा के दायरे में आता है तथा सार्वजनिक धन की भारी हानि के आरोप हैं।

    अंततः अदालत ने कहा कि

    सिर्फ लम्बी हिरासत अपने-आप में जमानत का आधार नहीं हो सकती, और याचिका खारिज कर दी।

    साथ ही, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि कार्यवाही में तेजी लाई जाए और जिन आरोपियों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं हो पा रही है, उनके मामलों को अलग कर शीघ्र सुनवाई आगे बढ़ाई जाए।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

    Next Story