पुलिस अधिकारियों के खिलाफ केस लड़ने वाले वकील को सुरक्षा देगी पंजाब पुलिस: हाईकोर्ट ने सशस्त्र सुरक्षा अधिकारी तैनात करने का दिया निर्देश
Praveen Mishra
4 Nov 2026 11:50 AM IST

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब पुलिस को अमलोह के एक वकील को सशस्त्र सुरक्षा अधिकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। वकील ने आरोप लगाया था कि खन्ना पुलिस के अधिकारियों के खिलाफ अपने मुवक्किलों की ओर से हाईकोर्ट में याचिकाएं दाखिल करने के बाद एक संदिग्ध SUV उसका पीछा कर रही थी और उसके घर के आसपास निगरानी रख रही थी।
जस्टिस मनीषा बत्रा ने कहा कि खतरे का आकलन करना मुख्य रूप से पुलिस का काम है। हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत राज्य का दायित्व है कि वह सुरक्षा को लेकर आशंका जताने वाले नागरिक की रक्षा करे।
कोर्ट ने कहा, "एक वकील न्यायालय का अधिकारी होता है और उसे बिना किसी भय के अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करने में सक्षम होना चाहिए। इसलिए, उचित होगा कि याचिकाकर्ता की शिकायत की नए सिरे से जांच होने और उसके खतरे का दोबारा आकलन किए जाने तक अंतरिम उपाय के तौर पर उसे सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।"
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता वर्ष 2009 से फतेहगढ़ साहिब जिले के अमलोह में वकालत कर रहा है। वह ऐसे मुवक्किलों का प्रतिनिधित्व करता है, जिन्होंने खन्ना पुलिस और CIA स्टाफ के अधिकारियों पर कथित दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए हाईकोर्ट में कई याचिकाएं दाखिल की हैं।
इन मुवक्किलों में से एक ने आरोप लगाया था कि मार्च 2026 में कुछ अज्ञात लोग सफेद महिंद्रा स्कॉर्पियो में आए और उसे रात के समय उठा ले गए। बाद में उसे एक FIR में गिरफ्तार दिखाया गया।
वकील के अनुसार, 26 जुलाई 2026 को काली फिल्म वाले शीशों की एक सफेद स्कॉर्पियो ने उसके घर से अमलोह कोर्ट परिसर तक उसका पीछा किया और फिर वापस लौट गई। बाद में यही गाड़ी उसके घर के पास खड़ी दिखाई दी, जिसकी तस्वीरें उसके घर में लगे CCTV कैमरों में भी कैद हुईं।
वकील ने आरोप लगाया कि उसके परिवार ने गाड़ी की तस्वीरें लीं, जिसमें चार लोग चेहरे ढके हुए बैठे दिखाई दिए। उनमें से एक व्यक्ति के पास कथित तौर पर हथियार भी था।
याचिकाकर्ता ने बताया कि ऑनलाइन नंबर प्लेट की जांच करने पर पता चला कि उस नंबर का पंजीकरण एक मर्सिडीज-बेंज कार के नाम पर था। तस्वीरों की तुलना करने के बाद उसे संदेह हुआ कि यह वही स्कॉर्पियो थी, जिसका इस्तेमाल पहले उसके मुवक्किल को उठाने की घटना में किया गया था, लेकिन अब उस पर दूसरी नंबर प्लेट लगी थी।
उसने उसी दिन पुलिस महानिदेशक (DGP) को शिकायत दी और 112 हेल्पलाइन पर भी संपर्क किया। हालांकि, उसका आरोप था कि कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
पुलिस ने क्या जवाब दिया?
खन्ना पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि उसके किसी भी थाने या CIA स्टाफ के खिलाफ याचिकाकर्ता को लेकर कोई मामला लंबित नहीं था और न ही किसी पुलिस टीम ने उसका पीछा किया था। पुलिस ने यह भी कहा कि संबंधित वाहन CIA स्टाफ का नहीं था।
दूसरी ओर, फतेहगढ़ साहिब के SSP ने बताया कि SHO ने मौके का दौरा किया था, लेकिन वहां ऐसी कोई गाड़ी नहीं मिली। जिले की सुरक्षा आकलन समिति ने भी यह कहते हुए खतरे की आशंका से इनकार किया कि याचिकाकर्ता को कोई सीधी धमकी नहीं मिली थी।
पुलिस ने उसके घर के आसपास गश्त बढ़ाने और कंट्रोल रूम के नंबर उपलब्ध कराने की बात भी कही। गाड़ी और CCTV फुटेज के संबंध में उसे खन्ना पुलिस से संपर्क करने की सलाह दी गई।
शिकायत की जांच में खामियां पाईं
हाईकोर्ट ने शिकायत की जांच के तरीके पर असंतोष जताया। कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने गाड़ी की नंबर प्लेट का पंजीकरण रिकॉर्ड से सत्यापन नहीं किया, जबकि ऐसा करना आसानी से संभव था।
इसके अलावा, वकील ने CCTV फुटेज और तस्वीरें उपलब्ध कराने की पेशकश की थी, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं था जिससे पता चले कि पुलिस ने इन साक्ष्यों को एकत्र किया या उनकी जांच की।
कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि खन्ना पुलिस की रिपोर्ट उसी CIA स्टाफ प्रभारी की रिपोर्ट पर आधारित थी, जिसके अधीनस्थ कर्मचारियों के खिलाफ शिकायत की गई थी।
वहीं, फतेहगढ़ साहिब पुलिस ने गाड़ी और CCTV फुटेज की जांच के लिए वकील को खन्ना पुलिस के पास भेज दिया, जबकि खन्ना पुलिस ने यह कहते हुए शिकायत बंद कर दी कि मामले की जांच फतेहगढ़ साहिब में चल रही है।
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत का महत्वपूर्ण हिस्सा बिना जांच के रह गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि जांच केवल निष्पक्ष होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखाई भी देनी चाहिए। किसी व्यक्ति से ऐसी जांच पर भरोसा करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, जो उसी अधिकारी की रिपोर्ट पर आधारित हो जिसके स्टाफ के खिलाफ शिकायत की गई है।
SIT और FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार
हालांकि, हाईकोर्ट ने विशेष जांच दल (SIT) गठित करने और सीधे FIR दर्ज करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया।
कोर्ट ने कहा कि केवल स्थानीय पुलिस के खिलाफ आरोप लगाए जाने के आधार पर नियमित रूप से SIT गठित करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।
State of West Bengal v. Committee for Protection of Democratic Rights और K.V. Rajendran v. Superintendent of Police के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे निर्देश असाधारण परिस्थितियों में ही दिए जाने चाहिए।
FIR दर्ज करने के अनुरोध पर कोर्ट ने Sakiri Vasu v. State of U.P. के फैसले का उल्लेख किया और याचिकाकर्ता को BNSS की धारा 175(3) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष जाने की स्वतंत्रता दी।
वकील को अंतरिम सुरक्षा देने का आदेश
सुरक्षा के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता पड़ोसी जिले के पुलिस अधिकारियों के खिलाफ मुकदमे लड़ रहा था और घटना वाले दिन उसने 112 हेल्पलाइन पर भी संपर्क किया था, जिसकी पुष्टि पुलिस ने की।
कोर्ट ने यह भी पाया कि सुरक्षा आकलन समिति ने वाहन के पंजीकरण नंबर का सत्यापन किए बिना और CCTV फुटेज की जांच किए बिना ही खतरे की आशंका को खारिज कर दिया था।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पंजाब पुलिस को वकील को एक सशस्त्र सुरक्षा अधिकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया। यह अंतरिम सुरक्षा उसकी शिकायत की नए सिरे से जांच और खतरे का दोबारा आकलन किए जाने तक जारी रहेगी।

