विदेश में भविष्य के इलाज की अनदेखी नहीं की जा सकती: मोटर दुर्घटना मुआवज़े में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ₹9.16 करोड़ दिए

Praveen Mishra

28 Jan 2026 3:12 PM IST

  • विदेश में भविष्य के इलाज की अनदेखी नहीं की जा सकती: मोटर दुर्घटना मुआवज़े में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ₹9.16 करोड़ दिए

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने एक मोटर दुर्घटना पीड़ित को दी गई मुआवज़ा राशि को ₹52 लाख से बढ़ाकर ₹9.16 करोड़ कर दिया है। अदालत ने कहा कि दावा करने वाले को 100% स्थायी कार्यात्मक विकलांगता हुई है और उसके भविष्य के चिकित्सीय उपचार की अनदेखी नहीं की जा सकती।

    कोर्ट ने इसके अतिरिक्त अमेरिका में उन्नत चिकित्सा उपचार के लिए ₹6 करोड़ का मुआवज़ा भी मंजूर किया।

    जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने कहा:

    “अपीलकर्ता/दावेदार पिछले दो दशकों से इस दुर्घटना के परिणाम भुगत रहा है—लगातार दर्द, बार-बार चिकित्सा हस्तक्षेप और अपने स्वास्थ्य व भविष्य को लेकर निरंतर अनिश्चितता के साथ। ऐसे मामलों में मुआवज़ा देना कोई उपहार नहीं, बल्कि पीड़ा को स्वीकार करना, कठिनाई को कम करना और उस व्यक्ति की आजीविका व गरिमा को सुरक्षित करना है, जिसे स्थायी और निरंतर विकलांगता के साथ जीने के लिए मजबूर किया गया है।”

    अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में बीमा कंपनी(यों) से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संवेदनशील और उदार दृष्टिकोण अपनाएँ।

    बीमा कंपनियों पर अदालत की टिप्पणी

    जस्टिस शर्मा ने कहा कि सामान्यतः 100 मामलों में से लगभग 10 मामलों में ही बीमा कंपनियों को मुआवज़ा देना पड़ता है। अन्य मामलों में, वाहन केवल एक वर्ष के लिए बीमित होता है और उस अवधि में यदि कोई दावा नहीं किया जाता, तो जनता द्वारा दिया गया प्रीमियम वापस नहीं होता।

    अदालत ने कहा:

    “यह सार्वजनिक धन निजी बीमा कंपनियों के खज़ाने में चला जाता है और सरकारी बीमा कंपनियों के मामले में सरकार को प्राप्त होता है, जिस पर ब्याज भी मिलता है। तर्कसंगत रूप से देखा जाए तो जिन मामलों में कोई दावा नहीं किया जाता, वहाँ जनता द्वारा दिया गया प्रीमियम अंततः जनता के हित में ही जाता है।”

    कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी को इस तरह के मामलों में मुआवज़ा देने के लिए अलग से धन की व्यवस्था नहीं करनी पड़ती। वर्तमान मामले में दी गई राशि, 'विशाल समुद्र से पानी की एक बूंद निकालने' के समान है।

    दुर्घटना और चोटें

    यह मामला 13 अक्टूबर 2002 की एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा है। उस समय 26 वर्षीय अपीलकर्ता, जो एक प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता थे, स्कूटर पर पीछे बैठे थे, तभी एक मारुति ज़ेन कार ने गलत साइड से लापरवाहीपूर्वक चलाते हुए सामने से टक्कर मार दी।

    दुर्घटना में दावेदार को गंभीर सिर, न्यूरोलॉजिकल और ऑर्थोपेडिक चोटें आईं, जिनसे उसे अपूरणीय क्षति हुई। इनमें शामिल हैं—

    दोनों कानों की पूर्ण सुनने की क्षमता समाप्त होना,

    क्रैनियल नर्व डैमेज,

    क्रॉनिक टिनिटस,

    अनिद्रा, अवसाद, चक्कर आना,

    और अनियंत्रित मधुमेह।

    निचली अदालत और अपील

    मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (ट्रिब्यूनल) ने बीमा कंपनी को जिम्मेदार ठहराते हुए ₹52 लाख का मुआवज़ा 9% ब्याज सहित दिया था।

    इस आदेश के खिलाफ दावेदार और बीमा कंपनी दोनों ने क्रॉस-अपील दायर की।

    हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के निष्कर्षों को बरकरार रखते हुए कहा कि एफआईआर दुर्घटना वाले दिन ही दर्ज हुई थी और प्रत्यक्षदर्शी की गवाही निर्विवाद रही। बीमा कंपनी कोई प्रत्युत्तर साक्ष्य पेश करने में विफल रही।

    अदालत ने Anita Sharma बनाम New India Assurance Co. Ltd. (2021) के फैसले पर भरोसा करते हुए दोहराया कि मोटर दुर्घटना दावे 'संभावनाओं के संतुलन' (preponderance of probabilities) के सिद्धांत पर तय किए जाते हैं, न कि संदेह से परे प्रमाण के आधार पर।

    भविष्य का इलाज और मुआवज़ा बढ़ोतरी

    दावेदार की सेहत दो दशकों बाद भी बिगड़ती देख, कोर्ट ने अतिरिक्त चिकित्सीय साक्ष्य स्वीकार किए और ट्रिब्यूनल से रिपोर्ट मंगवाई, जो 21 अप्रैल 2023 को प्रस्तुत की गई।

    कोर्ट ने पाया कि भारत में लंबे समय तक इलाज के बावजूद दावेदार की स्थिति और खराब हुई है और उसे उन्नत न्यूरोसर्जरी व कोक्लियर इम्प्लांट की आवश्यकता है, जो भारत में उपलब्ध नहीं है।

    PGIMER, कमांड हॉस्पिटल, एपेक्स हॉस्पिटल और मायो क्लिनिक (USA) के विशेषज्ञों की निर्विवाद रिपोर्टों के आधार पर अदालत ने माना कि दावेदार को 100% स्थायी कार्यात्मक विकलांगता है और उसका उन्नत इलाज अमेरिका में ही संभव है।

    भविष्य की सर्जरी, पुनर्वास, फॉलो-अप, यात्रा और अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने अमेरिका में इलाज के लिए ₹6 करोड़ की समेकित राशि मंजूर की।

    अदालत ने कहा:

    “अदालतें अपने वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करते समय ऐसे दावों के पीछे मौजूद मानवीय पहलू से आंख नहीं मूंद सकतीं। न्यायोचित, निष्पक्ष और उचित मुआवज़ा वही है, जो न केवल अतीत की चोटों का उत्तर दे, बल्कि भविष्य की चिकित्सा आवश्यकताओं को भी पूरा करे, ताकि दावेदार आजीवन पीड़ा को बिना पर्याप्त साधनों के न झेले।”

    इन कारणों से, हाईकोर्ट ने कुल मुआवज़ा बढ़ाकर ₹9.16 करोड़ कर दिया।

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