पूर्व IAS अधिकारी अशोक खेमका को 'एम्पैनल्ड एडिशनल सेक्रेटरी' माना जाए, नियुक्ति न करने के फैसले को मनमाना: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

Shahadat

9 Jun 2026 11:41 AM IST

  • पूर्व IAS अधिकारी अशोक खेमका को एम्पैनल्ड एडिशनल सेक्रेटरी माना जाए, नियुक्ति न करने के फैसले को मनमाना: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने रिटायर्ड IAS अधिकारी अशोक खेमका की याचिका को मंज़ूरी दी। कोर्ट ने कहा कि भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव/सचिव के पद के लिए एम्पैनलमेंट (सूचीबद्ध करने) से इनकार करना - जबकि अन्य अधिकारियों को ऐसी ही छूट दी गई - भेदभावपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।

    जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस दीपक मनचंदा की डिवीज़न बेंच सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT) के आदेशों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। CAT ने खेमका के एम्पैनलमेंट के दावे को इस आधार पर खारिज किया कि उन्होंने डिप्टी सेक्रेटरी या उससे ऊपर के स्तर पर तीन साल की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति (सेंट्रल डेप्युटेशन) की शर्त पूरी नहीं की थी।

    बेंच ने कहा,

    "जब याचिकाकर्ता जैसी स्थिति वाले अन्य अधिकारियों को भारत सरकार में अतिरिक्त सचिव/सचिव के रूप में एम्पैनलमेंट के लिए छूट दी गई तो याचिकाकर्ता को बिना किसी ठोस कारण के ऐसी छूट क्यों नहीं दी गई, यह सवाल बिना किसी ठोस जवाब के बना हुआ है।"

    1991 बैच के IAS अधिकारी खेमका ने तर्क दिया कि इसी तरह की स्थिति वाले कई अधिकारियों को इस शर्त से छूट दी गई और केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का अनुभव न होने के बावजूद उन्हें एम्पैनल किया गया। उन्होंने ऐसे उदाहरण भी दिए जब उनके दावे को खारिज किए जाने के बाद भी ऐसी छूट दी गई।

    कोर्ट ने माना कि भारत सरकार ने इस तथ्य का खंडन नहीं किया कि कई IAS अधिकारियों को पात्रता शर्तों में ढील देकर एम्पैनलमेंट दिया गया। कोर्ट ने देखा कि जब इसी तरह की स्थिति वाले अधिकारियों के पक्ष में ऐसी छूट का इस्तेमाल किया गया तो याचिकाकर्ता को बिना किसी अलग कारण के वही लाभ न देना भेदभाव के बराबर है।

    केंद्र सरकार के इस तर्क को खारिज करते हुए कि याचिकाकर्ता के रिटायरमेंट के कारण याचिका बेअसर हो गई, कोर्ट ने कहा कि एम्पैनलमेंट रिटायरमेंट के बाद के काम और भविष्य की संभावनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण बना रहता है।

    समानता का लाभ

    बेंच ने माना कि याचिकाकर्ता को वैसी ही छूट न देना समानता के सिद्धांतों का उल्लंघन है। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि अगर कोई अलग करने वाला कारण न हो तो समानता न देना भेदभावपूर्ण होगा।

    बेंच ने कहा,

    "अगर भारत सरकार ने डिप्टी सेक्रेटरी या उससे ऊपर के लेवल पर कम-से-कम तीन साल तक सेंट्रल डेप्युटेशन पर काम करने की शर्त में छूट देने का अधिकार इस्तेमाल किया। ऐसी छूट इसी तरह की स्थिति वाले IAS अधिकारियों को भी दी गई है तो ऐसा न करना निश्चित रूप से भेदभाव माना जाएगा। ऐसा तब तक भेदभाव माना जाएगा, जब तक कि कोर्ट के सामने कोई ऐसा अंतर न लाया जाए, जो याचिकाकर्ता और उन अन्य अधिकारियों के बीच हो, जिन्हें भारत सरकार में एडिशनल सेक्रेटरी के पद के लिए चुने जाते समय छूट दी गई।"

    बेंच ने आगे कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता और उन अन्य IAS अधिकारियों के बीच कोई ऐसा अंतर कोर्ट के सामने नहीं लाया गया, जिन्हें भारत सरकार में डिप्टी सेक्रेटरी या उससे ऊपर के पद पर काम करने की शर्त से छूट देकर एडिशनल सेक्रेटरी/सेक्रेटरी के पद के लिए चुना गया, इसलिए समान स्थिति वाले अधिकारियों के बीच ऐसा व्यवहार भेदभाव माना जाएगा और यह भारत के संविधान के आर्टिकल 14 और 16 का उल्लंघन होगा।

    कोर्ट ने साफ किया कि ऐसी स्थिति में याचिकाकर्ता को भी उसी तरह की स्थिति वाले अन्य अधिकारियों के बराबर माना जाना चाहिए ताकि उसे कोई नुकसान न हो।

    इसके अनुसार, कोर्ट ने याचिका को मंज़ूरी दी और निर्देश दिया कि हालांकि रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति (एम्पैनलमेंट) का कोई वास्तविक लाभ नहीं दिया जा सकता, लेकिन याचिकाकर्ता को भविष्य के उन कामों पर विचार करने के सीमित मकसद के लिए एडिशनल सेक्रेटरी/सेक्रेटरी के तौर पर चुना हुआ माना जाएगा, जिनके लिए ऐसी नियुक्ति ज़रूरी शर्त है।

    Title: Ashok Khemka v. Union of India and another

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