'दोषी महिला के बच्चे अपनी माँ को न खोएं': पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने छोटे बच्चे को ज़िंदा दफ़नाने वाली महिला की मौत की सज़ा बदली
Shahadat
29 Sept 2026 7:42 PM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने लुधियाना की महिला की मौत की सज़ा बदल दी। उसे अपने पड़ोसी की दो साल की पोती को अगवा करने और उसे गड्ढे में ज़िंदा दफ़नाने का दोषी पाया गया। कोर्ट ने उसकी सज़ा को बदलकर बिना किसी छूट के 30 साल की कठोर कैद कर दिया, जबकि उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी।
जस्टिस विनोद एस. भारद्वाज और जस्टिस रविंदर मलिक की डिवीज़न बेंच ने कहा कि हालांकि अपराध बहुत भयानक है, लेकिन इस मामले में मौत की सज़ा ही एकमात्र विकल्प नहीं है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी महिला को "सुधार से परे" या समाज के लिए खतरा नहीं माना जा सकता।
बेंच ने कहा,
"हम इस बात पर भी विचार करते हैं कि क्या मौत की सज़ा सज़ा की शुरुआत है या उसका अंत। वह सज़ा जिसमें किए गए अपराध के लिए हर दिन आत्म-चिंतन और पछतावे का समय मिले, वही सही मायने में सज़ा भुगतना है... एक माँ ने अपनी बेटी को खो दिया, लेकिन आरोपी महिला के बच्चे अपनी माँ को हमेशा के लिए न खोएं। समाज बच्चों को वह चीज़ न देकर नहीं बनता, जो उनकी माँ ने चुराई, बल्कि कुछ उम्मीद जगाकर बनता है।"
बच्ची के दादा के बयान पर FIR दर्ज की गई। बच्ची लगभग दो साल नौ महीने की थी और दोपहर करीब 2:15 बजे घर के बाहर गली में खेल रही थी, तभी वह लापता हो गई। उसके पिता पंजाब पुलिस में कर्मचारी हैं।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि उनकी पड़ोसी नीलम ने बच्ची को अगवा किया। उन्होंने इसके पीछे यह वजह बताई कि परिवार ने बच्ची की माँ को नीलम से बात करने से रोक दिया। अपने बयान में नीलम ने एक अलग वजह बताई। उसने कहा कि वह नाराज़ थी, क्योंकि बच्ची के पिता अपने बच्चों के लिए चीज़ें लाते थे और उसके अपने बच्चे भी ऐसी चीज़ों की माँग करते थे जिन्हें वह खरीद नहीं सकती है।
दोपहर करीब 2:50 बजे, जी.टी. रोड पर एल्डिको सिटी के पास एक प्लॉट पर तैनात सिक्योरिटी गार्ड ने एक महिला को काले रंग के एक्टिवा स्कूटर पर एक छोटे बच्चे को पास के चारदीवारी वाले खाली प्लॉट में ले जाते और लगभग दस मिनट बाद अकेले बाहर आते देखा। उसने वहां से गुज़र रही PCR पेट्रोलिंग टीम को रोका। पुलिस को बच्चे के जूते और एक गड्ढे पर ताज़ी रेत मिली; उन्होंने बच्चे को बाहर निकाला, जिसके मुंह, नाक और कानों में रेत भरी हुई थी। उसे DMC अस्पताल ले जाया गया, जहां शाम 5:41 बजे उसे मृत घोषित कर दिया गया। उसी रात नीलम को गिरफ़्तार कर लिया गया।
सेशन कोर्ट ने 12.04.2024 के फ़ैसले में उसे IPC की धाराओं 364, 302 और 201 के तहत दोषी ठहराया। 18.04.2024 के आदेश से कोर्ट ने उसे धारा 302 के तहत मौत की सज़ा, धारा 364 के तहत उम्रकैद और धारा 201 के तहत सात साल की कठोर सज़ा सुनाई। कोर्ट ने मौत की सज़ा की पुष्टि के लिए मामला हाई कोर्ट भेजा और नीलम ने अपील दायर की।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि मामला परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित है और सबूतों की कड़ी अधूरी है। वकील ने बताया कि शाम 7:15 बजे FIR दर्ज होने से पहले ही शव बरामद कर लिया गया और बच्चे को मृत घोषित कर दिया गया। अस्पताल के रिकॉर्ड में बच्चे की पहचान होने से पहले ही उसका नाम और उसके दादा का फ़ोन नंबर दर्ज है और उसमें जांच अधिकारी का नाम भी शामिल है। वकील ने तर्क दिया कि इससे समय और रिकॉर्ड में छेड़छाड़ का पता चलता है।
वकील ने यह भी तर्क दिया कि जूते जानबूझकर घटनास्थल पर छोड़े गए ताकि बाद में "बरामदगी" के ज़रिए आरोपी को मामले से जोड़ा जा सके और सुरक्षा गार्ड एक 'प्लांटेड' (जानबूझकर खड़ा किया गया) गवाह है, जो लगभग 100 फ़ीट की दूरी से साफ़ तौर पर नहीं देख सकता।
बिना खुदाई के औज़ार के कोई महिला दस मिनट के भीतर गड्ढा खोदकर बच्चे को दफ़ना नहीं सकती है।
आगे यह भी कहा गया कि CCTV फ़ुटेज और कॉल रिकॉर्ड के लिए धारा 65-B के तहत दिए गए सर्टिफ़िकेट में कमियां हैं, क्योंकि असली DVR ज़ब्त नहीं किया गया और 'सेफ़ सिटी' फ़ुटेज ऐसे डेटा सेंटर से आया है, जो सर्टिफ़ाई करने वाले अधिकारी के अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
परिवार के किसी परिचित के सामने किया गया 'एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन' (न्यायालय के बाहर किया गया इकबालिया बयान) अस्वाभाविक है और शिकायतकर्ता व पुलिस ने घटना के दो अलग-अलग मकसद बताए।
राज्य और शिकायतकर्ता ने CCTV फ़ुटेज का सहारा लिया, जिसमें आरोपी को बच्चे को अपने स्कूटर पर ले जाते हुए और बाद में अकेले लौटते हुए देखा गया। उन्होंने कॉल रिकॉर्ड, उन गवाहों के बयानों (जिन्होंने बच्चे को आखिरी बार महिला के साथ देखा था) और एविडेंस एक्ट की धारा 106 पर भी भरोसा किया, क्योंकि आरोपी ने इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया कि वह बच्चे से कैसे अलग हुई।
समय और रिकॉर्ड
पक्षकारों की दलीलें सुनने के बाद बेंच ने माना कि अज्ञात बच्चे के शव का मिलना और लापता बच्चे की शिकायत दो अलग-अलग घटनाएं हैं। उन्हें आपस में जोड़ने में समय लगा। बेंच ने डॉक्टरों की इस बात को मान लिया कि बच्चे का नाम और उसके दादा का फ़ोन नंबर अस्पताल के रिकॉर्ड में बाद में जोड़ा गया।
बेंच ने माना कि आरोपी का पता लगाने और उसके खुलासे के बाद शव बरामद करने को प्राथमिकता देना पुलिस का सही कदम था। बेंच ने कहा कि घटनाओं का क्रम निष्पक्ष जांच को दिखाता है, न कि किसी संदिग्ध जांच को।
आखिरी बार देखा जाना
बेंच को गवाहों की एक कड़ी मिली, न कि सिर्फ़ एक बार देखा जाना; पड़ोसी के CCTV कैमरे में आरोपी को दोपहर करीब 2:15 से 2:17 बजे के बीच बच्चे को ले जाते हुए रिकॉर्ड किया गया और एक दुकानदार, जो उन दोनों को जानता था, ने उन्हें दोपहर करीब 2:30 बजे जालंधर बाईपास के पास एक साथ देखा था।
सिक्योरिटी गार्ड ने उसे दोपहर 2:50 बजे बच्चे के साथ प्लॉट में घुसते और अकेले बाहर निकलते देखा था। उसके कुछ ही देर बाद उसी प्लॉट से शव बरामद हुआ था। सतपाल बनाम हरियाणा राज्य, राजस्थान राज्य बनाम काशी राम और नागेंद्र साह बनाम बिहार राज्य के मामलों का हवाला देते हुए बेंच ने माना कि समय का कम अंतर "किसी बीच की संभावना की गुंजाइश नहीं" छोड़ता है। इसलिए धारा 106 के तहत सबूत पेश करने की ज़िम्मेदारी आरोपी पर आ गई। धारा 313 के तहत अपने बयान में कोई स्पष्टीकरण न दे पाना "अपराध साबित करने की कड़ी में एक ज़रूरी अतिरिक्त कड़ी" थी।
बेंच ने सिक्योरिटी गार्ड को स्वाभाविक गवाह माना जिसका "कोई निजी स्वार्थ नहीं" है। साइट प्लान में कोई रुकावट न मिलने पर बेंच ने माना कि वह लगभग 30 मीटर की दूरी से देख सकता है। बेंच ने कहा कि उसका PCR पेट्रोलिंग को रोकना एक समझदार व्यक्ति का काम है।
CCTV और कॉल रिकॉर्ड
बेंच ने माना कि धारा 65-B के तहत सर्टिफ़िकेट के लिए किसी तय फ़ॉर्मेट की ज़रूरत नहीं है। इसे वैसे ही पढ़ा जाना चाहिए जैसे कोई आम आदमी समझेगा। बेंच ने इस आपत्ति को खारिज कर दिया कि पड़ोसी का सर्टिफ़िकेट पुलिस ने लिखा था। बेंच ने माना कि पड़ोसी का यह बयान कि फुटेज "पूरी तरह से सही" है, DVR और पेन ड्राइव दोनों पर लागू होता है। 'सेफ़ सिटी' फ़ुटेज के मामले में कोर्ट ने माना कि 'सेफ़ सिटी प्रोजेक्ट' के इंचार्ज अफ़सर, अर्जुन पंडितराव खोतकर मामले के तहत "ज़िम्मेदार सरकारी पद पर" है। धारा 65-B(3) के तहत, कैमरे और डेटा सेंटर मिलकर एक ही कंप्यूटर माने जाते हैं।
कोर्ट ने यह भी देखा कि ट्रायल के दौरान सबूत पेश करने के तरीके पर कोई आपत्ति नहीं जताई गई। 'सोनू बनाम हरियाणा राज्य', 'एम.आर. हिरेमथ' और 'राहिल बनाम राज्य' मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी आपत्ति अपील के दौरान पहली बार नहीं उठाई जा सकती।
गड्ढा खोदना
बेंच ने इस दलील को खारिज किया कि आरोपी दस मिनट में गड्ढा नहीं खोद सकता। कोर्ट ने माना कि प्रॉसिक्यूशन का केस यह है कि प्लॉट में गड्ढा पहले से ही मौजूद है और तीन साल से कम उम्र का बच्चा कोई विरोध नहीं कर सकता।
कोर्ट ने आगे कहा कि PCR कर्मियों की पहली प्राथमिकता बच्चे को जल्द से जल्द अस्पताल ले जाना थी, न कि सबूत इकट्ठा करना, जो कि जांच एजेंसी का काम था। इसलिए घटनास्थल पर जूते छोड़ना संदिग्ध नहीं है।
मकसद
बेंच ने माना कि शिकायतकर्ता ने सिर्फ़ अपना शक जताया है कि आरोपी के मन में रंजिश क्यों हो सकती है। आरोपी का असली कारण इससे अलग हो सकता है। इस अंतर से अभियोजन पक्ष का मामला कमज़ोर नहीं होता।
बेंच ने सज़ा बरकरार रखी और अपील खारिज की।
आरोपी के वकील ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कोई मानसिक बीमारी या खतरनाक व्यक्तित्व लक्षण नहीं पाए गए, और जेल में उसके संतोषजनक व्यवहार और अच्छे संबंधों का भी ज़िक्र किया। उन्होंने एक सामाजिक रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें दिखाया गया कि वह बहुत गरीबी में रहने वाले एक सामाजिक रूप से पिछड़े परिवार से आई।
शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एक बेबस बच्चे को ज़िंदा दफ़नाना क्रूरता दिखाता है, लेकिन उन्होंने रिपोर्टों पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
बेंच ने पहले के फैसलों की समीक्षा की, जिनमें एडिगा अनाम्मा, बच्चन सिंह, माछी सिंह, संतोष कुमार बरियार और शंकर किसानराव खाडे के मामले शामिल थे। इसने खास तौर पर सुंदर बनाम राज्य (2024) मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने सात साल के बच्चे के अपहरण और हत्या के मामले में मौत की सज़ा को कम कर दिया।
वहां सुप्रीम कोर्ट ने माना कि "सबसे दुर्लभ मामलों में दुर्लभतम" (Rarest of Rare) टेस्ट के लिए यह ज़रूरी है कि सुधार की कोई संभावना न हो, न कि सिर्फ़ अपराध गंभीर हो। सुंदर मामले में भी स्वामी श्रद्धानंद मामले का पालन करते हुए यह माना गया कि कुछ मामलों में छूट (Remission) के साथ आजीवन कारावास अपर्याप्त हो सकता है।
बेंच ने माना कि आरोपी को सुधार से परे या समाज के लिए खतरा नहीं माना जा सकता। उसने गौर किया कि उसके अपने बच्चे हैं, उसने कोई खराब व्यवहार नहीं दिखाया और साथी कैदियों के साथ अच्छे संबंध बनाए रखे हैं।
इसने मौत की सज़ा को 30 साल की कठोर कैद में बदल दिया, जिसमें कोई छूट नहीं मिलेगी। साथ ही ₹50,000 का जुर्माना लगाया, या जुर्माना न भरने पर एक साल की अतिरिक्त कठोर कैद होगी। IPC की धारा 364 और 201 के तहत सज़ाएं बरकरार रखी गईं, और सभी सज़ाएं एक साथ चलेंगी।
Case Title: State of Punjab v. Neelam (murder reference); Neelam v. State of Punjab (appeal)

