प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने परीक्षा घोटाले के मामले में MBBS स्टूडेंट का निष्कासन रद्द किया

Shahadat

11 March 2026 10:15 AM IST

  • प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने परीक्षा घोटाले के मामले में MBBS स्टूडेंट का निष्कासन रद्द किया

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हाल ही में आदेश रद्द किया, जिसमें पं. बी.डी. शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान यूनिवर्सिटी से एक MBBS स्टूडेंट को कथित परीक्षा घोटाले के सिलसिले में निष्कासित कर दिया गया था। कोर्ट ने यह माना कि यह सज़ा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना दी गई।

    ऐसा करते हुए कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को निर्देश दिया कि वे स्टूडेंट को अनुशासन बोर्ड की सिफारिशें उपलब्ध कराने और उसे व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देने के बाद इस मामले पर फिर से विचार करें।

    जस्टिस कुलदीप तिवारी ने कहा,

    "रिकॉर्ड का गहन अध्ययन करने पर इस कोर्ट की यह राय है कि यद्यपि अनुशासन बोर्ड के समक्ष कार्यवाही अध्यादेश के तहत निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार आयोजित की गई, फिर भी वाइस चांसलर द्वारा पारित विवादित आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन न करने के कारण दोषपूर्ण है। वाइस चांसलर ने याचिकाकर्ता को सुनवाई का कोई अवसर दिए बिना और अनुशासन बोर्ड की सिफारिशों की प्रति उपलब्ध कराए बिना, केवल अपने समक्ष रखे गए रिकॉर्ड और सिफारिशों के आधार पर ही विवादित आदेश पारित कर दिया।"

    याचिकाकर्ता 2020 बैच का एक MBBS स्टूडेंट है। उसने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर द्वारा 2 फरवरी, 2026 को पारित आदेश को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। इस आदेश के तहत उसे तत्काल प्रभाव से निष्कासित कर दिया गया और उन विषयों में उसके परीक्षा परिणाम रद्द कर दिए गए थे, जिनमें कथित तौर पर कदाचार (नकल) हुआ।

    उसने बाद में पारित एक अन्य आदेश को भी चुनौती दी, जिसमें उसे कॉलेज और हॉस्टल परिसर खाली करने का निर्देश दिया गया।

    याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि विवादित आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हुए पारित किया गया। यह दलील दी गई कि वाइस चांसलर ने सज़ा देने से पहले न तो याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया और न ही उसे अनुशासन बोर्ड की सिफारिशें उपलब्ध कराईं।

    याचिकाकर्ता ने आगे तर्क दिया कि कथित कदाचार में उसकी संलिप्तता साबित करने वाला कोई विश्वसनीय सबूत मौजूद नहीं था, और यह कि निष्कासन — जो कि सबसे कठोर सज़ा है — पूरी तरह से असंगत और अत्यधिक था।

    यूनिवर्सिटी ने अपनी कार्रवाई का बचाव किया

    यूनिवर्सिटी की ओर से पेश हुए सीनियर वकील ने याचिका का विरोध किया और दलील दी कि यह अनुशासनात्मक कार्रवाई एक बड़े पैमाने पर हुए परीक्षा घोटाले की विस्तृत जांच के बाद की गई।

    यह दलील दी गई कि यह मामला सबसे पहले तब सामने आया, जब MBBS परीक्षाओं के संचालन और मूल्यांकन में अनियमितताओं के संबंध में शिकायत प्राप्त हुई। एक शुरुआती जांच समिति बनाई गई, जिसने अपनी 13 फरवरी, 2025 की रिपोर्ट में 30 स्टूडेंट्स (याचिकाकर्ता सहित) की उत्तर पुस्तिकाओं में गंभीर गड़बड़ियों की ओर इशारा किया।

    रिपोर्ट के अनुसार, जांच में पाया गया कि उम्मीदवारों द्वारा इस्तेमाल की गई उत्तर पुस्तिकाओं के सीरियल नंबर और आधिकारिक रिकॉर्ड में मेल नहीं था; उत्तर पुस्तिकाओं की अदला-बदली या हेर-फेर के संकेत मिले; और 46 गायब खाली उत्तर पुस्तिकाओं की एक सूची मिली, जिनके इस घोटाले में इस्तेमाल होने का संदेह था।

    इस रिपोर्ट के आधार पर कुलपति ने 'स्टूडेंट्स के बीच अनुशासन बनाए रखने' संबंधी यूनिवर्सिटी के अध्यादेश के तहत एक 'अनुशासन बोर्ड' का गठन किया।

    जांच ​​के दौरान, सभी 30 स्टूडेंट्स को बुलाया गया। जहां 26 स्टूडेंट्स ने दावा किया कि उत्तर पुस्तिकाओं में लिखी लिखावट उन्हीं की है, वहीं चार स्टूडेंट्स ने कहा कि कुछ उत्तर पुस्तिकाओं में लिखी लिखावट उनकी नहीं है।

    बाद में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त एक लिखावट विशेषज्ञ ने अपनी राय दी कि विवादित उत्तर पुस्तिकाओं में लिखी वह लिखावट, जिसे याचिकाकर्ता की बताया जा रहा था, उसकी अपनी स्वीकार की गई लिखावट के नमूने से मेल नहीं खाती।

    इसके बाद याचिकाकर्ता को एक 'कारण बताओ नोटिस' जारी किया गया, जिसमें पूछा गया कि उस पर निष्कासन (यूनिवर्सिटी से निकालने) की सज़ा क्यों न लागू की जाए। अनुशासन बोर्ड ने अंततः सबसे कड़ी सज़ा की सिफ़ारिश की, जिसे कुलपति ने स्वीकार कर लिया।

    यूनिवर्सिटी ने यह भी बताया कि इस कथित घोटाले के संबंध में 15 फरवरी, 2025 को FIR नंबर 25 के तहत एक लिपिक कर्मचारी और 24 स्टूडेंट्स (याचिकाकर्ता सहित) के ख़िलाफ़ एक आपराधिक मामला भी दर्ज किया गया।

    कोर्ट ने प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन को पाया

    रिकॉर्ड की जांच करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि अनुशासन बोर्ड के सामने की कार्यवाही संबंधित अध्यादेश में तय प्रक्रिया के अनुसार ही की गई। हालांकि, कोर्ट ने माना कि वाइस चांसलर द्वारा पारित अंतिम आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं था, क्योंकि उसमें प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया।

    कोर्ट ने पाया कि वाइस चांसलर ने निष्कासन का आदेश पूरी तरह से अनुशासन बोर्ड की सिफारिशों के आधार पर ही पारित किया, जबकि उन्होंने याचिकाकर्ता को उन सिफारिशों की कोई प्रति नहीं दी और न ही उसे जवाब देने का कोई अवसर दिया।

    जस्टिस तिवारी ने फैसला दिया कि कोई भी प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले याचिकाकर्ता को अनुशासन बोर्ड की सिफारिशें उपलब्ध कराई जानी चाहिए थीं और उसे अपनी आपत्तियां दर्ज करने तथा अपनी बात रखने का मौका दिया जाना चाहिए था।

    कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपों की गंभीरता किसी भी तरह से प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने को सही नहीं ठहरा सकती।

    सुनवाई के बाद नया फैसला देने का आदेश

    तदनुसार, हाईकोर्ट ने विवादित आदेशों को रद्द किया और याचिकाकर्ता को 5 मार्च, 2026 को वाइस चांसलर के सामने पेश होने का निर्देश दिया।

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि अनुशासन बोर्ड की सिफारिशें याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराई जाएं, जिसके बाद उसे अपनी आपत्तियां दर्ज करने के लिए सात दिन का समय दिया जाएगा। इसके अलावा, वाइस चांसलर को यह भी निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दें और उसके बाद कानून के अनुसार एक नया आदेश पारित करें।

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के पालन के मुद्दे तक ही सीमित थीं और उन्हें आरोपों की मेरिट (गुण-दोष) पर कोर्ट की कोई राय नहीं माना जाना चाहिए।

    Title: MUNISH v. STATE OF HARYANA AND ORS.

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