देश के लिए लड़ने वालों की तारीफ़ होनी चाहिए: हाईकोर्ट ने कहा- युद्ध में लगी चोट की पेंशन का बकाया सिर्फ़ तीन साल तक सीमित नहीं किया जा सकता
Shahadat
28 Aug 2026 10:42 AM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें युद्ध में लगी चोट की पेंशन के बकाये को ओरिजिनल एप्लीकेशन दाखिल करने से पहले के तीन साल तक सीमित कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि जब पेंशन पाने का अधिकार ही विवाद में नहीं है तो सैनिक या - जैसा कि इस मामले में है - उनकी विधवा उस तारीख से बकाया पाने की हकदार हैं, जब से यह अधिकार शुरू हुआ। [2026 LiveLaw (PH) 297]
जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस अमरविंदर सिंह ग्रेवाल की डिवीज़न बेंच ने कहा,
"जिस व्यक्ति ने देश के लिए लड़ाई लड़ी और जिसके चेहरे पर शेल (गोले) की चोट लगी, जिससे उसकी आँख को नुकसान पहुंचा, वह तारीफ़ और सम्मान का हकदार है, न कि उसके दावे को खारिज करने के कारण खोजने का," और यह भी कहा कि "भारत सरकार को ऐसे बहादुर सैनिक को मिलने वाले लाभ देने चाहिए थे।"
याचिकाकर्ता के पति को 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान तैनाती के समय उनके चेहरे के बाईं ओर शेल (गोले) से चोट लगी थी, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें "हाइपरमेट्रोपिक एस्टिग्मैटिज्म, बाईं आँख" की समस्या हो गई। चोट को सैन्य सेवा से जुड़ा हुआ माना गया, लेकिन युद्ध के दौरान चोट लगने के बावजूद उन्हें युद्ध में लगी चोट की पेंशन का लाभ नहीं दिया गया।
आखिरकार दावा करने के बाद लाभ दिया गया, लेकिन आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल, रीजनल बेंच, चंडीगढ़ ने 21.08.2019 के आदेश (MA नंबर 1737 और 1738/2019 और OA नंबर 1856/2017) के ज़रिए देय बकाये को ओरिजिनल एप्लीकेशन दाखिल करने से पहले के तीन साल की अवधि तक सीमित कर दिया। हाईकोर्ट में उस प्रतिबंध को चुनौती दी गई।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि युद्ध में लगी चोट की पेंशन का लाभ उस समय भी उपलब्ध था और राज्य को बिना किसी दावे के यह लाभ देना चाहिए, खासकर इसलिए क्योंकि मूल तथ्य कभी विवाद में नहीं थे।
भारत सरकार के वकील ने मूल तथ्यात्मक स्थिति पर कोई विवाद नहीं किया, लेकिन कहा कि याचिकाकर्ता या उनके पति को सतर्क रहना चाहिए और पहले ही लाभ का दावा करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि हकदारी (Entitlement) पर कोई विवाद नहीं था; ट्रिब्यूनल के इस फैसले के खिलाफ कोई याचिका दायर नहीं की गई कि याचिकाकर्ता युद्ध में लगी चोट के लिए पेंशन पाने की हकदार है।
कोर्ट ने माना कि जब 1971 में देश के लिए लड़ते हुए लगी चोट को मिलिट्री सर्विस से जुड़ा माना गया तो इसका फायदा "घायल सैनिक या उसके परिवार द्वारा दावा किए जाने के बजाय... राज्य-प्रतिवादियों (State-Respondents) द्वारा दिया जाना चाहिए।"
कोर्ट ने यह सवाल उठाया कि क्या पेंशन को सीमित किया जा सकता है, "खासकर तब जब पेंशन का दावा करने के लिए कोई समय-सीमा (Limitation Period) नहीं है"। पेंशन को बार-बार मिलने वाला अधिकार (Recurring Cause of Action) मानते हुए कोर्ट ने बलबीर सिंह और SGT गिरीश कुमार के मामलों में तय कानून का हवाला दिया और कहा कि बकाया राशि (Arrears) पर लगी रोक को हटा दिया जाना चाहिए।
इस साल की शुरुआत में तय हुए SGT गिरीश कुमार मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कई अहम बातें कहीं कि पेंशन "न तो कोई इनाम है और न ही कोई अनुग्रह राशि (Ex Gratia Payment)", बल्कि यह एक पक्का और लागू करने योग्य अधिकार है जो आर्टिकल 300A के तहत संपत्ति का दर्जा रखता है। इसे कानून के अधिकार के बिना रोका या कम नहीं किया जा सकता — यह सिद्धांत विकलांगता पेंशन पर भी "पूरी सख्ती" से लागू होता है, जो सेवा की अवधि के बजाय बलिदान को मान्यता देता है।
कोर्ट ने कहा कि ऐसी पॉलिसी कमिटमेंट करने के बाद, केंद्र सरकार "अपनी बात से पीछे नहीं हट सकती और यह तर्क नहीं दे सकती कि ऐसी बकाया राशि दावे से पहले के तीन साल की अवधि तक ही सीमित होनी चाहिए," क्योंकि ऐसा करना "सिद्धांत रूप में अधिकार को स्वीकार करने के बावजूद असल में उसके मुख्य हिस्से से इनकार करने जैसा होगा।"
समय-सीमा (Limitation) की दलील को भी खारिज किया गया, क्योंकि विकलांगता पेंशन की 'ब्रॉड-बैंडिंग' (Broad-Banding) का मुद्दा दिसंबर 2014 में ही अंतिम रूप से तय हुआ।
ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता उस तारीख से युद्ध में लगी चोट की पेंशन की बकाया राशि पाने की हकदार है, जिस तारीख से उसके पति इसके हकदार बने थे। साथ ही कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा बकाया राशि को तीन साल तक सीमित करने वाली रोक को भी हटा दिया।
Case Title: Ranjit Kaur v. Union of India and others


