Haryana Civil Services: हाईकोर्ट ने शुरुआती परीक्षा के नतीजों में दखल देने से इनकार किया, फाइनल आंसर की को सही ठहराया

Shahadat

25 Jun 2026 9:21 AM IST

  • Haryana Civil Services: हाईकोर्ट ने शुरुआती परीक्षा के नतीजों में दखल देने से इनकार किया, फाइनल आंसर की को सही ठहराया

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सिविल सर्विसेज (HCS) (एग्जीक्यूटिव ब्रांच) और उससे जुड़ी सेवाओं की शुरुआती परीक्षा के नतीजों को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज किया। कोर्ट ने दोहराया कि विषय के जानकारों द्वारा तय की गई आंसर की में दखल देने के मामले में अदालतों को संयम बरतना चाहिए। [2026 LiveLaw (PH) 208]

    जस्टिस जगमोहन बंसल ने कहा,

    "इस मामले में संबंधित आयोग ने ईमानदारी और पारदर्शिता से काम किया। आयोग ने उम्मीदवारों द्वारा उठाए गए सभी मुद्दों को सुलझाने की कोशिश की। अगर याचिकाकर्ताओं की बात मान ली जाए तो आपत्तियां उठाने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होगा और आयोग के लिए चयन प्रक्रिया को पूरा करना नामुमकिन हो जाएगा। कोर्ट इस बात को नजरअंदाज नहीं कर सकता कि यह शुरुआती परीक्षा थी और फाइनल परीक्षा इस महीने के आखिर में होने वाली है।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि कुछ असफल उम्मीदवारों के कहने पर इस कोर्ट का कोई भी दखल पूरी चयन प्रक्रिया को रोक देगा, जो आम जनता और फाइनल परीक्षा के लिए चुने गए उम्मीदवारों, दोनों के लिए नुकसानदेह होगा।

    कोर्ट कई ऐसी याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिनमें उम्मीदवारों ने 2026 में जारी विज्ञापन के तहत 4 मई, 2026 को घोषित नतीजों को रद्द करने की मांग की।

    आंसर की और नतीजों को चुनौती

    26 अप्रैल, 2026 को हुई शुरुआती परीक्षा में शामिल होने वाले याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि प्रोविजनल और फाइनल, दोनों आंसर की में कई जवाब गलत थे। उन्होंने तर्क दिया कि जनरल स्टडीज और एप्टीट्यूड टेस्ट से जुड़े सवालों में गलतियों ने पूरी चयन प्रक्रिया को खराब कर दिया।

    यह भी तर्क दिया गया कि हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) ने दूसरों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर उम्मीदवारों को जवाब देने का मौका दिए बिना ही आंसर की में बदलाव किया। उन्होंने निष्पक्षता के सिद्धांतों के उल्लंघन का दावा करने के लिए हाई कोर्ट के पिछले फैसले का हवाला दिया।

    आयोग ने विशेषज्ञों की राय पर काम किया

    हालांकि, HPSC ने कहा कि उम्मीदवारों से मिली आपत्तियों को विषय के जानकारों के पास भेजा गया। विशेषज्ञों की राय के आधार पर आंसर की में बदलाव किया गया और बाद में दूसरी समीक्षा के बाद उसे फिर से सही ठहराया गया। आयोग ने जोर देकर कहा कि आंसर की को अंतिम रूप देने से पहले क्रॉस-आपत्तियों या उम्मीदवारों की सुनवाई का कोई नियम नहीं है।

    कोर्ट ने न्यायिक समीक्षा के सीमित दायरे पर ज़ोर दिया

    'रण विजय सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' और 'यूपीपीएससी बनाम राहुल सिंह' जैसे पुराने मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने फिर से कहा कि यह साबित करने की ज़िम्मेदारी उम्मीदवारों की है कि आंसर की (उत्तर कुंजी) "साफ़ तौर पर गलत" है और एकेडमिक मामलों में कोर्ट को विशेषज्ञों की राय के बजाय अपनी राय नहीं थोपनी चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि वह आंसर शीट का दोबारा मूल्यांकन या आंसर की की दोबारा जांच तब तक नहीं कर सकता, जब तक कि कोई स्पष्ट और निर्विवाद गलती साबित न हो जाए।

    आंसर की में कोई स्पष्ट गलती नहीं मिली

    विवादित सवालों की जांच करने के बाद कोर्ट ने माना कि यह पक्के तौर पर साबित नहीं किया जा सकता कि विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए जवाब साफ़ तौर पर गलत थे। शक के मामलों में भी—जैसे हरियाणा परिवार पहचान अधिनियम, 2021 से जुड़ा सवाल—इसका फ़ायदा परीक्षा लेने वाली अथॉरिटी को ही मिलना चाहिए।

    कोर्ट ने छोटी-मोटी संख्यात्मक गलतियों और बजट से जुड़े सवालों की व्याख्या के बारे में उठाई गई आपत्तियों को भी खारिज किया और कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक दखल की ज़रूरत नहीं है।

    क्रॉस-ऑब्जेक्शन का कोई अधिकार नहीं

    क्रॉस-ऑब्जेक्शन (जवाबी आपत्ति) दाखिल करने का मौका न मिलने के मुद्दे पर, कोर्ट ने कहा कि विज्ञापन में ऐसी प्रक्रिया के लिए कोई कानूनी नियम या शर्त नहीं है। ऐसी दलील को मानने से आपत्तियों का कभी न खत्म होने वाला सिलसिला शुरू हो जाएगा और चयन प्रक्रिया में देरी होगी।

    भर्ती प्रक्रिया समय पर पूरी होने में जनहित

    कोर्ट ने यह भी कहा कि कुछ असफल उम्मीदवारों के कहने पर दखल देने से पूरी भर्ती प्रक्रिया पटरी से उतर सकती है, खासकर तब जब अंतिम परीक्षा होने वाली हो, जिससे बड़ी संख्या में उम्मीदवारों और लोक प्रशासन पर बुरा असर पड़ेगा।

    आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में कोई मनमानी या गैर-कानूनी बात न पाते हुए कोर्ट ने याचिकाओं को खारिज किया और प्रारंभिक परीक्षा का परिणाम बरकरार रखा।

    Title: Vardhman Ranjan v. State of Haryana and Another

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