सोशल मीडिया फ़ोटो पर आधारित Arms Act का केस टिकने लायक नहीं, कब्ज़े का कोई सबूत नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

Shahadat

24 March 2026 7:45 PM IST

  • सोशल मीडिया फ़ोटो पर आधारित Arms Act का केस टिकने लायक नहीं, कब्ज़े का कोई सबूत नहीं: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने FIR रद्द की

    पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि Arms Act की धारा 25(1-B)(a) और 29(B) के तहत मुक़दमा तब तक नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि गैर-कानूनी कब्ज़ा, हथियारों की सुपुर्दगी, या ज़रूरी अपराधिक इरादा जैसे ज़रूरी तत्व मौजूद न हों। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा लगता है कि यह मुक़दमा राजनीतिक रंजिश की पृष्ठभूमि में शुरू किया गया, क्योंकि याचिकाकर्ता एक राजनीतिक हस्ती हैं और विपक्षी राजनीतिक दल के सदस्य हैं।

    जस्टिस सूर्य प्रताप सिंह बजरंग दास और एक अन्य व्यक्ति द्वारा CrPC की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में सोशल मीडिया पर एक तीसरे व्यक्ति विकास द्वारा पोस्ट की गई तस्वीरों के आधार पर दर्ज FIR रद्द करने की मांग की गई। इन तस्वीरों में विकास को अलग-अलग हथियार पकड़े हुए देखा गया और उसने कथित तौर पर कहा कि इनमें से कुछ हथियार याचिकाकर्ताओं के थे, जो कांग्रेस पार्टी से जुड़े राजनीतिक व्यक्ति थे।

    अभियोजन पक्ष का तर्क था कि याचिकाकर्ताओं के पास लाइसेंस होने के बावजूद, उन्होंने अपने हथियारों का इस्तेमाल किसी अनाधिकृत व्यक्ति को करने दिया, जिससे उन पर Arms Act के तहत दायित्व बनता है। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि हथियारों के किसी भी आपराधिक इस्तेमाल का कोई आरोप नहीं था और पूरा मामला केवल तस्वीरों और एक 'खुलासा बयान' पर आधारित था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह मामला राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित था।

    कोर्ट ने धारा 25(1-B)(a) के तत्वों की जांच की और फ़ैसला दिया कि यह प्रावधान वहां लागू होता है, जहां कोई व्यक्ति कानून का उल्लंघन करते हुए हथियार हासिल करता है या अपने कब्ज़े में रखता है। कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ताओं के पास बिना लाइसेंस के कोई हथियार था। इसलिए धारा 25 के तहत कोई अपराध नहीं बनता था।

    धारा 29(B) के संबंध में कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि इस अपराध के लिए किसी दूसरे व्यक्ति को बिना उसकी अनुमति की पुष्टि किए हथियारों की "सुपुर्दगी" (Delivery) होना ज़रूरी है। वास्तव में कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के अनुसार भी तस्वीरें तब ली गईं, जब हथियार घर में ही पड़े थे। ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ताओं ने सह-आरोपी को हथियारों की वास्तविक सुपुर्दगी या कब्ज़े का हस्तांतरण किया।

    कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में एक विसंगति भी नोट की, क्योंकि उन अन्य व्यक्तियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई, जिनके हथियार वैसी ही तस्वीरों में दिखाई दे रहे थे; इससे यह संकेत मिलता है कि इस मामले में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया गया। कोर्ट ने आगे कहा कि 'मेन्स रिया' (अपराधिक इरादे) का ज़रूरी तत्व इसमें मौजूद नहीं था, क्योंकि ऐसा कोई आरोप नहीं था कि याचिकाकर्ताओं का हथियारों का कोई गैर-कानूनी इस्तेमाल करने का इरादा था।

    कोर्ट ने टिप्पणी की,

    “किसी अपराध को करने के लिए 'मेन्स रिया' का होना ज़रूरी है। इस मामले में न तो ऐसा कोई उदाहरण है और न ही कोई आरोप कि विकास के कब्ज़े में मिला हथियार किसी गैर-कानूनी काम को करने के इरादे से उसे सौंपा गया। इसलिए इस मामले में 'मेन्स रिया' का तत्व भी गायब है।”

    कोर्ट ने कहा कि ऐसा लगता है कि यह मुकदमा राजनीतिक दुश्मनी की वजह से शुरू किया गया और इसका कोई कानूनी आधार नहीं था। कोर्ट ने गौर किया कि याचिकाकर्ता नंबर 1 एक राजनीतिक हस्ती हैं। फिलहाल विपक्षी राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं, जिन्हें आम चुनावों से कुछ ही महीने पहले इस मुकदमे में शामिल किया गया।

    इसलिए हाईकोर्ट ने याचिका मंज़ूर की और याचिकाकर्ताओं के खिलाफ FIR रद्द की।

    Case Title: Bajrang Dass & Anr. v. State of Haryana & Anr. [CRM-M-30985-2021]

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