भ्रष्टाचार के मामले में पूर्व पुलिस अधिकारी को अग्रिम ज़मानत नहीं: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने जांच में जोखिम की ओर इशारा किया
Shahadat
8 July 2026 10:06 AM IST

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने अवैध रिश्वत मांगने के आरोपी पूर्व पुलिस अधिकारी को अग्रिम ज़मानत देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार "जनता का भरोसा कम करते हैं" और गिरफ्तारी से पहले सुरक्षा देते समय अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए। [2025 LiveLaw (PH) 222]
याचिका खारिज करते हुए जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा कि आरोपों की प्रकृति को देखते हुए इस चरण में अग्रिम ज़मानत देने से चल रही जांच में बाधा आएगी।
कोर्ट ने कहा,
"आर्थिक अपराध और भ्रष्टाचार से जुड़े अपराध जनता का भरोसा कम करते हैं, इसलिए अग्रिम ज़मानत की सुविधा देते समय अदालतों को सावधानी बरतनी चाहिए। अपराध की प्रकृति को देखते हुए यह कोर्ट इस चरण में गिरफ्तारी से पहले ज़मानत देने के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे जांच में बाधा आएगी।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता का यह दावा कि उसे झूठे मामले में फंसाया गया, तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल खड़े करता है, जिनका फैसला केवल जांच के बाद या मुकदमे के दौरान ही किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा,
"इस चरण में अग्रिम ज़मानत देने से चल रही जांच में बाधा आने की संभावना है। याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों से पता चलता है कि उसने पुलिस अधिकारी के तौर पर मिले अधिकार का इस्तेमाल शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने के लिए किया। अगर मुकदमे के दौरान ऐसे आरोप साबित हो जाते हैं तो यह सरकारी पद का दुरुपयोग और भ्रष्टाचार माना जाएगा। इसके अलावा, याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय कार्यवाही पहले ही हो चुकी है और उसे सज़ा भी दी जा चुकी है।"
कोर्ट फरीदाबाद में 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988' की धारा 7 के तहत दर्ज FIR में अग्रिम ज़मानत की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता—जो भारतीय सेना के रिटायर्ड जूनियर कमीशंड ऑफिसर हैं—ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता, जो उस समय सब-इंस्पेक्टर के पद पर तैनात थे, ने एक पुरानी FIR की जांच के दौरान ₹10,000 की मांग की और बाद में झूठे मामले में फंसाने की धमकी देकर अतिरिक्त ₹20,000 मांगे। बताया गया कि यह कथित घटना शिकायतकर्ता की वर्कशॉप में लगे CCTV फुटेज में रिकॉर्ड हुई।
इसके बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई, जिसके परिणामस्वरूप उसे सज़ा दी गई।
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि FIR तीन साल से अधिक की बिना किसी कारण की देरी के बाद दर्ज की गई और यह बाद में सोचा-समझा कदम था। एक पुरानी जांच रिपोर्ट पर भरोसा किया गया, जिसमें कथित तौर पर उन्हें बरी कर दिया गया; वकील का तर्क था कि CCTV फुटेज में ऑडियो न होने से रिश्वत की मांग का सबूत नहीं मिलता, जो 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' के तहत एक ज़रूरी बात है।
आगे यह भी तर्क दिया गया कि कोई ट्रैप, रिकवरी या स्वतंत्र गवाह नहीं था, और शिकायतकर्ता एक 'इंटरेस्टेड विटनेस' (हित रखने वाला गवाह) था। याचिकाकर्ता ने पहले मिली विभागीय सज़ा का भी ज़िक्र किया और दावा किया कि आपराधिक कार्यवाही शुरू करना 'डबल जियोपार्डी' (एक ही अपराध के लिए दो बार सज़ा) के बराबर है। जांच में सहयोग का भरोसा भी दिया गया।
याचिका का विरोध करते हुए राज्य ने तर्क दिया कि आरोप गंभीर हैं और इनमें एक पुलिस अधिकारी द्वारा रिश्वत लेने के लिए अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग शामिल है। यह बताया गया कि विभागीय नतीजे याचिकाकर्ता के खिलाफ थे और दिखाते थे कि आरोप बेबुनियाद नहीं थे।
राज्य ने ज़ोर दिया कि सच्चाई का पता लगाने के लिए कस्टोडियल पूछताछ (हिरासत में पूछताछ) ज़रूरी है और अग्रिम ज़मानत देने से रिकवरी में रुकावट आ सकती है और जांच में बाधा पड़ सकती है।
अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आरोप शिकायतकर्ता पर दबाव डालने के लिए सार्वजनिक पद के संभावित दुरुपयोग की ओर इशारा करते हैं, जो साबित होने पर भ्रष्टाचार माना जाएगा।
अदालत ने आगे कहा कि हालांकि आपराधिक कार्यवाही में विभागीय नतीजे निर्णायक नहीं होते, लेकिन वे यह संकेत देते हैं कि आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद नहीं हैं। इस चरण में झूठे आरोप का प्राथमिक तौर पर सबूत देने के लिए रिकॉर्ड पर कोई सामग्री नहीं रखी गई थी।
व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक हित के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए अदालत ने कहा कि अपराध की प्रकृति और गंभीरता, आरोपी की भूमिका और निष्पक्ष जांच की ज़रूरत पर विचार किया जाना चाहिए।
अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री और शुरुआती जांच आरोपों के लिए एक उचित आधार दिखाती है और अग्रिम ज़मानत देने से "प्रभावी जांच में बाधा" आएगी।
बेंच ने 'स्टेट बनाम अनिल शर्मा (1997) 7 SCC 187' का हवाला देते हुए दोहराया कि कस्टोडियल पूछताछ, अग्रिम ज़मानत से सुरक्षित संदिग्ध से पूछताछ की तुलना में गुणात्मक रूप से अधिक प्रभावी होती है, और ऐसी सुरक्षा पूछताछ को "महज एक रस्म" बना सकती है।
इसने 'देविंदर कुमार बंसल बनाम पंजाब राज्य (2025)' का भी ज़िक्र किया और कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों में अग्रिम ज़मानत केवल असाधारण परिस्थितियों में दी जानी चाहिए, जहां आरोप तुच्छ या राजनीतिक रूप से प्रेरित लगें।
आरोपों की गंभीरता और जांच के चरण को देखते हुए अदालत ने माना कि अग्रिम ज़मानत देने का कोई मामला नहीं बनता है और याचिका खारिज की।
Title: Veer Sain v. State of Haryana


