'शक सबूत की जगह नहीं ले सकता': पटना हाईकोर्ट ने आरा कोर्ट धमाका मामले में आरोपियों को बरी किया, मौत की सज़ा रद्द की
Shahadat
27 March 2026 8:37 PM IST

176 पन्नों के फ़ैसले में पटना हाई कोर्ट ने आरा सिविल कोर्ट बम धमाका मामले में कई आरोपियों की सज़ा रद्द की। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष (सरकारी वकील) परिस्थितियों की कड़ी को बिना किसी उचित संदेह के साबित करने में नाकाम रहा। साथ ही यह दोहराया कि "शक, चाहे कितना भी मज़बूत क्यों न हो, सबूत की जगह नहीं ले सकता।"
चीफ़ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद की डिवीज़न बेंच भोजपुर, आरा के एडिशनल सेशंस जज द्वारा चलाए गए मुक़दमे से जुड़े आपराधिक अपीलों के साथ-साथ CrPC की धारा 366 (BNSS की धारा 407) के तहत 'डेथ रेफरेंस' (मौत की सज़ा की पुष्टि के लिए भेजा गया मामला) पर सुनवाई कर रही थी। ट्रायल कोर्ट ने IPC और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम के अलग-अलग प्रावधानों के तहत कई आरोपियों को दोषी ठहराया था; ज़्यादातर को उम्रकैद और एक आरोपी को मौत की सज़ा सुनाई थी।
अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, 23.01.2015 को आरा में सिविल कोर्ट परिसर में एक बम धमाका हुआ था, जब कैदियों को एक वैन से कोर्ट लॉक-अप में ले जाया जा रहा था। इस धमाके में एक कांस्टेबल और उस महिला की मौत हो गई, जिसने कथित तौर पर बम धमाका किया था। साथ ही कई अन्य लोग घायल हो गए। आरोप था कि यह धमाका दो आरोपियों को न्यायिक हिरासत से भगाने की साज़िश का हिस्सा था।
अपीलकर्ताओं ने कई आधारों पर अपनी सज़ा को चुनौती दी, जिनमें गवाहों के बयानों में विसंगतियां, अहम गवाहों से पूछताछ न होना, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों का स्वीकार्य न होना और इक़बालिया बयानों पर गलत तरीके से भरोसा करना शामिल था। यह तर्क भी दिया गया कि CrPC की धारा 313 के तहत आरोपियों से पूछताछ के दौरान, उनके खिलाफ़ जाने वाली अहम परिस्थितियों को उनके सामने नहीं रखा गया, जिससे उन्हें गंभीर नुकसान हुआ।
शुरुआत में हाईकोर्ट ने यह बात नोट की कि बम धमाके की घटना—जिसमें उसका समय और जगह भी शामिल है—को लेकर कोई विवाद नहीं था। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह मामला पूरी तरह से परिस्थितिजन्य सबूतों पर आधारित था। इसलिए ऐसे मामलों को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना ज़रूरी था। 'शरद बिरदीचंद सारडा' मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि अभियोजन पक्ष को परिस्थितियों की एक पूरी कड़ी स्थापित करनी होगी।
मृतक महिला और आरोपियों के बीच कथित संबंध के बारे में कोर्ट ने पाया कि ऐसा कोई विश्वसनीय सबूत नहीं था, जिससे उनके बीच पहले से किसी तरह के जुड़ाव का पता चलता हो। हालांकि FIR में यह सुझाव दिया गया कि महिला पहले भी आरोपी से मिलती थी, लेकिन ट्रायल के दौरान गवाहों की गवाही से इस बात की पुष्टि नहीं हुई। कोर्ट ने माना कि इस तरह की विसंगतियों के कारण अभियोजन पक्ष की कहानी अविश्वसनीय हो गई।
अभियोजन पक्ष के इस दावे पर कि महिला ने आरोपी को एक बैग सौंपने की कोशिश की थी, कोर्ट ने पाया कि सबूत ठोस नहीं थे। कोर्ट ने गौर किया कि आरोपी और महिला के बीच किसी भी तरह के हाव-भाव, इशारे या बातचीत का कोई सबूत नहीं था और न ही आरोपी ने बैग लेने की कोई कोशिश की थी। कोर्ट को यह बात भी अविश्वसनीय लगी कि गवाह इस तरह के इरादे का अंदाज़ा कैसे लगा सकते थे, जबकि महिला को आरोपी तक पहुँचने से पहले ही रोक दिया गया।
महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने माना कि CrPC की धारा 313 के तहत आरोपी से पूछताछ के दौरान इस कथित परिस्थिति का ज़िक्र नहीं किया गया, इसलिए इसका इस्तेमाल उनके खिलाफ नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि आरोपी को इस तरह की महत्वपूर्ण और उनके खिलाफ जाने वाली सामग्री से अवगत न कराने के कारण उन्हें गंभीर नुकसान पहुंचा और ट्रायल कोर्ट ने जिस आधार पर भरोसा किया था, वह आधार ही कमज़ोर पड़ गया।
इलेक्ट्रॉनिक सबूतों के मुद्दे पर कोर्ट ने माना कि कॉल डिटेल रिकॉर्ड और टावर लोकेशन डेटा तब तक स्वीकार्य नहीं हैं, जब तक कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B(4) के तहत कोई प्रमाण पत्र न हो और किसी सक्षम अधिकारी की गवाही न हो। कोर्ट ने आगे यह भी गौर किया कि घटनास्थल से बरामद मोबाइल फोन और मृत महिला के बीच कथित संबंध स्थापित नहीं हो पाया था, खासकर तब जब मुख्य गवाहों की गवाही नहीं ली गई।
कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों के सामने आरोपी द्वारा दिए गए इकबालिया बयानों पर किए गए भरोसे को भी खारिज किया और माना कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के तहत ऐसे बयान स्वीकार्य नहीं हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सह-आरोपियों के इकबालिया बयानों को मुख्य सबूत के तौर पर नहीं माना जा सकता, बल्कि उनका इस्तेमाल केवल सीमित हद तक पुष्टि करने के लिए ही किया जा सकता है।
आपराधिक साज़िश के आरोप पर कोर्ट ने माना कि केवल शक या एक जैसा आचरण ही काफी नहीं है, बल्कि आरोपियों के बीच किसी समझौते का स्पष्ट सबूत होना ज़रूरी है। इस तरह के समझौते को साबित करने वाले स्वीकार्य सबूतों के अभाव में ट्रायल कोर्ट द्वारा साज़िश के संबंध में दिया गया फैसला कायम नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने आगे यह भी गौर किया कि घटना के बाद आरोपी का केवल फरार हो जाना ही, अपने आप में, बम धमाके के लिए उनके दोषी होने का सबूत नहीं हो सकता।
तदनुसार, कोर्ट ने कई अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी किया और माना कि अभियोजन पक्ष "उचित संदेह से परे" (Beyond Reasonable Doubt) अपना मामला साबित करने में असफल रहा। दो अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि को IPC की धारा 224 (हिरासत से भागना) के तहत अपराध को छोड़कर, अन्य सभी आरोपों से रद्द कर दिया गया; इस अपराध के लिए उनकी सज़ा बरकरार रखी गई। अभियुक्तों में से एक को दी गई मृत्युदंड की सज़ा भी रद्द की गई।
Case Title: State of Bihar v. Lamboo Sharma @ Munna Sharma @ Sachidanand Sharma

