टेंडर डॉक्यूमेंट जमा करने की शर्त में बोली लगाने वाले द्वारा उसे सही तरीके से पूरा करना और प्रमाणित करना शामिल है: पटना हाईकोर्ट

Shahadat

9 Sept 2026 8:26 PM IST

  • टेंडर डॉक्यूमेंट जमा करने की शर्त में बोली लगाने वाले द्वारा उसे सही तरीके से पूरा करना और प्रमाणित करना शामिल है: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि टेंडर डॉक्यूमेंट जमा करने की शर्त में यह ज़रूरी है कि डॉक्यूमेंट को बोली लगाने वाले ने सही तरीके से पूरा किया हो और प्रमाणित किया हो।

    कोर्ट ने कहा,

    "डॉक्यूमेंट जमा करने की शर्त के साथ यह भी ज़रूरी है कि डॉक्यूमेंट को बोली लगाने वाले ने सही तरीके से पूरा किया हो और प्रमाणित किया हो।"

    एक्टिंग चीफ जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस राजेश कुमार वर्मा की खंडपीठ, M/s शुभराज कंस्ट्रक्शन द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस याचिका में नगर परिषद, मोकामा द्वारा 'नल-जल योजना' के तहत काम पूरा करने के लिए निकाले गए टेंडर में तकनीकी रूप से अयोग्य ठहराए जाने को चुनौती दी गई।

    याचिकाकर्ता ने 30.06.2025 के संशोधित अल्पकालिक टेंडर नोटिस नंबर 03/2025-26 में भाग लिया और सभी आठ समूहों के लिए बोलियां जमा की थीं। टेंडर प्रक्रिया के दौरान, M/s प्रार्थना कंस्ट्रक्शन ने मौजूदा प्रतिबद्धताओं को छिपाने, दस्तावेजों में हेरफेर और अन्य अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए शिकायत की थी। तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया गया और बाद में शिकायत को आधारहीन और गलत पाया गया।

    टेंडर प्रक्रिया लंबित रही और बोली की वैधता अवधि समाप्त हो गई। इसके बाद याचिकाकर्ता ने बोली की वैधता बढ़ाने के लिए अपनी बिना शर्त सहमति दी। 15.06.2026 को, तकनीकी टेंडर समिति ने ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल पर अपलोड किए गए हलफनामे की तुलना याचिकाकर्ता द्वारा जमा किए गए मूल हलफनामे से की और हस्ताक्षरों में अंतर पाया। नतीजतन, याचिकाकर्ता को टेंडर आमंत्रित करने वाले नोटिस के क्लॉज 21(1) के तहत तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित कर दिया गया।

    याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि NIT के क्लॉज 21(1) में हस्ताक्षरों के मेल न खाने को तकनीकी अयोग्यता का आधार नहीं माना गया। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता के दस्तावेजों और हस्ताक्षरों की जांच पहले ही तीन सदस्यीय जांच समिति द्वारा की जा चुकी थी, जिसने शिकायत को आधारहीन पाया। यह भी तर्क दिया गया कि अगर मान भी लिया जाए कि हस्ताक्षरों में कोई अंतर था, तो यह कमी ठीक की जा सकती थी और याचिकाकर्ता को इसे समझाने या ठीक करने का मौका दिया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने इस बात पर विचार किया कि क्या प्रतिवादियों का याचिकाकर्ता को NIT के क्लॉज 21(1) के तहत हस्ताक्षरों में अंतर के आधार पर अयोग्य ठहराना उचित है। कोर्ट ने कहा कि टेंडर की शर्तों के तहत ज़रूरी डॉक्यूमेंट्स को तय तरीके से और पूरी तरह से जमा करना ज़रूरी था। कोर्ट ने देखा कि सिर्फ़ एक हलफ़नामा (Affidavit) अपलोड करना ही काफ़ी नहीं, बल्कि यह पक्का करना भी ज़रूरी है कि अपलोड किया गया हलफ़नामा, याचिकाकर्ता द्वारा जमा किए गए असली हलफ़नामे से मेल खाता हो और बिल्कुल वैसा ही हो।

    कोर्ट ने कहा:

    “हमारी राय में कोई डॉक्यूमेंट जमा करने की शर्त का मतलब यह भी है कि डॉक्यूमेंट को बोली लगाने वाले (Bidder) द्वारा सही तरीके से तैयार और प्रमाणित (Authenticate) किया गया हो। अपलोड किए गए डॉक्यूमेंट पर मौजूद हस्ताक्षर में कोई बड़ी गड़बड़ी, जब उसकी तुलना असली डॉक्यूमेंट से की जाती है तो वह सीधे तौर पर डॉक्यूमेंट की प्रमाणिकता और सही तरीके से तैयार किए जाने से जुड़ी होती है। इसे महज़ तकनीकी या मामूली अंतर नहीं माना जा सकता। इसलिए टेक्निकल टेंडर कमेटी का उस गड़बड़ी की जाँच करना और यह तय करना सही था कि क्या डॉक्यूमेंट टेंडर की शर्तों को पूरा करता है या नहीं।”

    कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता ने टेक्निकल टेंडर कमेटी के निष्कर्षों को गलत साबित करने के लिए कोई भी ज़रूरी सबूत पेश नहीं किया। इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि रेस्पॉन्डेंट्स (प्रतिवादियों) का डॉक्यूमेंट्स में गड़बड़ी को NIT के क्लॉज़ 21(1) के तहत अयोग्यता का आधार मानना ​​सही है और इस फ़ैसले में रिट अधिकार क्षेत्र (Writ Jurisdiction) के तहत दखल देने की कोई ज़रूरत नहीं है।

    प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के मुद्दे पर कोर्ट ने देखा कि याचिकाकर्ता को उस गड़बड़ी के बारे में साफ़ तौर पर बताया गया और उसे अपना दावा, आपत्ति और टिप्पणी जमा करने के लिए तीन दिन का समय दिया गया। हालांकि, याचिकाकर्ता ने तय समय के अंदर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई। इसके बजाय 27.06.2026 को अपना पक्ष (Representation) रखा।

    कोर्ट ने कहा कि जब किसी को सही तरीके से मौका दिया जाता है तो वह व्यक्ति सिर्फ़ इसलिए प्राकृतिक न्याय के उल्लंघन की शिकायत नहीं कर सकता, क्योंकि उसने उस मौके का फ़ायदा नहीं उठाया।

    इसलिए कोर्ट को रेस्पॉन्डेंट्स के फ़ैसले में दखल देने का कोई आधार नहीं मिला।

    Case Title: M/s Shubhraj Construction v. State of Bihar and Ors

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story