PDS कॉन्ट्रैक्टर पर कालाबाज़ारी के लिए अनाज डायवर्ट करने का आरोप: ट्रायल का इंतज़ार किए बिना ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है- पटना हाईकोर्ट

Shahadat

16 July 2026 7:00 PM IST

  • PDS कॉन्ट्रैक्टर पर कालाबाज़ारी के लिए अनाज डायवर्ट करने का आरोप: ट्रायल का इंतज़ार किए बिना ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है- पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम (PDS) के तहत अनाज के ट्रांसपोर्टेशन के लिए नियुक्त कॉन्ट्रैक्टर को ब्लैकलिस्ट किया जा सकता है और उसका कॉन्ट्रैक्ट खत्म किया जा सकता है, भले ही कालाबाज़ारी के लिए अनाज डायवर्ट करने के आरोपों से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही का नतीजा अभी न आया हो। कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ी कार्रवाई आपराधिक दायित्व से अलग है और इसे स्वतंत्र रूप से किया जा सकता है, अगर कॉन्ट्रैक्टर का व्यवहार कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के मुताबिक नहीं पाया जाता है।

    जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस रंजन कुमार झा की डिवीज़न बेंच ने ट्रांसपोर्टेशन एग्रीमेंट रद्द करने, कॉन्ट्रैक्टर को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट करने और सिक्योरिटी डिपॉज़िट व बैंक गारंटी ज़ब्त करने को चुनौती देने वाली रिट याचिका खारिज की।

    प्रतिवादी-कॉर्पोरेशन ने बिहार के विभिन्न ज़िलों में PDS के तहत अनाज की डोरस्टेप डिलीवरी के लिए ट्रांसपोर्टिंग और हैंडलिंग एजेंटों की नियुक्ति के लिए टेंडर मंगाए। याचिकाकर्ता को कैमूर ज़िले के लिए कॉन्ट्रैक्टर के तौर पर चुना गया, जिसके बाद 31 अगस्त, 2016 को एक एग्रीमेंट किया गया।

    कॉन्ट्रैक्ट के दौरान, एक FIR दर्ज की गई जिसमें आरोप लगाया गया कि PDS के लिए तय चावल की 26 बोरियाँ याचिकाकर्ता के ट्रैक्टर और ट्रेलर में कालाबाज़ारी के लिए ले जाई जा रही थीं, जिन्हें पुलिस ने रोककर ज़ब्त कर लिया। इस घटना के बाद कॉर्पोरेशन के मैनेजिंग डायरेक्टर ने कारण बताओ नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ता का जवाब देखने के बाद कॉर्पोरेशन ने एग्रीमेंट रद्द कर दिया, याचिकाकर्ता को तीन साल के लिए ब्लैकलिस्ट कर दिया और उसकी सिक्योरिटी डिपॉज़िट व बैंक गारंटी ज़ब्त कर ली।

    हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि की गई कार्रवाई सही नहीं थी क्योंकि किसी भी सबूत से कालाबाज़ारी में उसकी संलिप्तता साबित नहीं हुई थी। उसने कहा कि ज़ब्त की गई बोरियाँ PDS की बोरियाँ नहीं थीं और FIR में भी संबंधित डीलर का यह पक्ष दर्ज था कि ज़ब्त किया गया अनाज उसकी अपनी कृषि उपज थी। यह भी तर्क दिया गया कि कॉर्पोरेशन को दंडात्मक कॉन्ट्रैक्ट-संबंधी कार्रवाई करने से पहले आपराधिक कार्यवाही के नतीजे का इंतज़ार करना चाहिए।

    कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज किया और कहा कि कॉन्ट्रैक्ट की शर्तें कॉर्पोरेशन को यह अधिकार देती हैं कि वह कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का उल्लंघन होने पर एग्रीमेंट खत्म कर दे और कॉन्ट्रैक्टर को ब्लैकलिस्ट कर दे, चाहे आपराधिक मुकदमा चल रहा हो या नहीं।

    बेंच ने कहा:

    "क्लॉज़ 10.2 को एग्रीमेंट के क्लॉज़ 11, 15.4 और क्लॉज़ 17 से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों को एक-दूसरे के साथ मिलाकर और सामंजस्य बिठाकर समझा जाना चाहिए। जहाँ क्लॉज़ 10.2 सिक्योरिटी डिपॉज़िट और बैंक गारंटी ज़ब्त करके नुकसान की भरपाई से संबंधित है, वहीं क्लॉज़ 15.4 और 17 कॉर्पोरेशन को कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों का उल्लंघन होने पर एग्रीमेंट खत्म करने और कॉन्ट्रैक्टर को ब्लैकलिस्ट करने का अधिकार देते हैं। इसलिए अगर ट्रांसपोर्टर का व्यवहार एग्रीमेंट के तहत तय शर्तों का उल्लंघन करता है तो सिर्फ़ इसलिए कि कोई निश्चित आर्थिक नुकसान नहीं हुआ, कॉर्पोरेशन का कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता।"

    याचिकाकर्ता की इस दलील पर कि कॉर्पोरेशन को आपराधिक मामले के खत्म होने का इंतज़ार करना चाहिए था, कोर्ट ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट से जुड़ा रिश्ता अलग आधार पर काम करता है।

    कोर्ट ने कहा:

    "की गई कार्रवाई याचिकाकर्ता की आपराधिक ज़िम्मेदारी पर नहीं, बल्कि पार्टियों के बीच के रिश्ते को तय करने वाली कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों पर आधारित है। कॉन्ट्रैक्ट के तहत प्रशासनिक कार्रवाई का पैमाना आपराधिक मुक़दमे से अलग होता है। रेस्पॉन्डेंट-कॉर्पोरेशन यह तय करने के लिए सक्षम था कि क्या याचिकाकर्ता का व्यवहार कॉन्ट्रैक्ट के रिश्ते को जारी रखने के लायक था, चाहे आपराधिक मामले का नतीजा कुछ भी हो।"

    कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता को एक विस्तृत 'शो कॉज़ नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) दिया गया और कार्रवाई करने से पहले उसके स्पष्टीकरण पर ठीक से विचार किया गया। इसलिए कोर्ट ने पाया कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का काफ़ी हद तक पालन किया गया।

    यह मानते हुए कि टेंडर की शर्तों के क्लॉज़ 10.2, 11, 15.4 और 17 को लागू करते समय कॉर्पोरेशन ने कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के दायरे में रहकर काम किया, कोर्ट को एग्रीमेंट खत्म करने, याचिकाकर्ता को ब्लैकलिस्ट करने और सिक्योरिटी डिपॉज़िट व बैंक गारंटी ज़ब्त करने के फ़ैसले में कोई गैर-कानूनी बात नहीं मिली। इसलिए रिट याचिका खारिज कर दी गई।

    Case Title: Dharmendra Kumar Patel v. State of Bihar and Ors.

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