सोशल मीडिया पर यूनिवर्सिटी में कथित गड़बड़ियों के बारे में किया पोस्ट: पटना हाईकोर्ट ने स्टूडेंट का अनिश्चितकालीन निष्कासन रद्द किया

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    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि यूनिवर्सिटी किसी स्टूडेंट को जांच रिपोर्ट दिए बिना और प्रस्तावित सज़ा पर जवाब देने का खास मौका दिए बिना उसे अनिश्चित काल के लिए निष्कासित नहीं कर सकती। कोर्ट ने माना कि ऐसी कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।

    जस्टिस हरीश कुमार की सिंगल जज बेंच ने महात्मा गांधी सेंट्रल यूनिवर्सिटी, पूर्वी चंपारण के मीडिया स्टडीज़ विभाग के पहले सेमेस्टर के पोस्ट-ग्रेजुएट स्टूडेंट की याचिका पर सुनवाई की। छात्र ने यूनिवर्सिटी से अपने सस्पेंशन और उसके बाद हुए निष्कासन को चुनौती दी थी।

    यह विवाद तब शुरू हुआ, जब याचिकाकर्ता ने यूनिवर्सिटी में एक नॉन-टीचिंग कर्मचारी, दिनेश हुड्डा के प्रमोशन की प्रक्रिया में गड़बड़ियों का आरोप लगाया। याचिकाकर्ता के अनुसार, उसके और दूसरों की शिकायतों के बावजूद यूनिवर्सिटी ने कथित गड़बड़ियों पर कोई कार्रवाई नहीं की। खुद को व्हिसलब्लोअर बताते हुए, याचिकाकर्ता ने बाद में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के ज़रिए इन कथित प्रशासनिक गड़बड़ियों को सार्वजनिक किया।

    इसके बाद चीफ प्रॉक्टर ने 12.07.2024 को एक कारण बताओ नोटिस (Show-Cause Notice) जारी किया। इसमें आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता का व्यवहार और अनुशासनहीनता एक स्टूडेंट के लिए उचित नहीं थी और यह साइबर अपराध से जुड़े दंडात्मक प्रावधानों के दायरे में आता है। याचिकाकर्ता ने 18.07.2024 को अपना स्पष्टीकरण दिया और यूनिवर्सिटी से संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने का अनुरोध भी किया। 19.07.2024 को दूसरा कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसका जवाब याचिकाकर्ता ने 25.07.2024 को दिया।

    इसके बावजूद, याचिकाकर्ता को 25.07.2024 को सस्पेंड कर दिया गया। इसके बाद 14.08.2024 के आदेश से उसे तुरंत प्रभाव से यूनिवर्सिटी से निष्कासित किया गया, यूनिवर्सिटी के किसी भी कैंपस या परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया गया और यूनिवर्सिटी के किसी भी अध्ययन कार्यक्रम में एडमिशन लेने से प्रतिबंधित कर दिया गया।

    याचिकाकर्ता ने इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि निष्कासन अनिश्चित काल के लिए था और उसे निष्कासन की प्रस्तावित सज़ा पर जवाब देने का कोई खास मौका नहीं दिया गया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें अनुशासन समिति की रिपोर्ट नहीं दी गई।

    अदालत ने सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ एक्ट, 2009 के ऑर्डिनेंस 17 की जांच की, जो छात्रों के अनुशासन बनाए रखने से संबंधित है। क्लॉज़ 4 में जुर्माना, कैंपस में बैन, निष्कासन (Expulsion) और रस्टिकेशन (Rustication) जैसी सज़ाओं का प्रावधान है, जबकि क्लॉज़ 6 यह अनिवार्य करता है कि ऐसी कोई भी सज़ा तब तक नहीं दी जाएगी जब तक छात्र को अपना बचाव करने का उचित मौका न दिया जाए।

    अदालत ने यह भी गौर किया कि ऑर्डिनेंस 17 का क्लॉज़ 22(b) प्रॉक्टर को किसी स्टूडेंट को अधिकतम दो हफ़्ते की अवधि के लिए सस्पेंड या रस्टिकेट करने का अधिकार देता है। सेंट्रल यूनिवर्सिटीज़ के लिए मॉडल ऑर्डिनेंस 49 के क्लॉज़ 12(2) में भी इसी तरह की सीमा तय की गई।

    हालांकि अदालत ने उस चरण में शुरुआती सस्पेंशन की वैधता पर फैसला करना ज़रूरी नहीं समझा, लेकिन उसे बाद की अनुशासनात्मक प्रक्रिया में गंभीर कमियां मिलीं। अदालत ने पाया कि भले ही मामला अनुशासन समिति को भेजा गया था, लेकिन याचिकाकर्ता को कभी भी समिति की रिपोर्ट या जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री नहीं दी गई।

    इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनिश्चित काल के लिए निष्कासन की कठोर सज़ा देने से पहले, यूनिवर्सिटी ने याचिकाकर्ता को कोई खास 'शो-कॉज़ नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) जारी नहीं किया था जिसमें उसे बताया जाता कि उसके खिलाफ निष्कासन का प्रस्ताव है।

    अदालत ने कहा:

    “अनिश्चित काल के लिए निष्कासन की कठोर सज़ा देने से पहले भी - जो पहली नज़र में एक्ट और ऑर्डिनेंस के तहत अधिकृत भी नहीं लगती है - याचिकाकर्ता को जांच रिपोर्ट के साथ कोई खास 'शो-कॉज़ नोटिस' नहीं दिया गया कि उसे यूनिवर्सिटी से क्यों न निकाला जाए।”

    अदालत ने माना कि यूनिवर्सिटी की कार्रवाई निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतरी और इसने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लंघन किया। अदालत ने यह भी माना कि एक्ट और ऑर्डिनेंस के खिलाफ जाकर अनिश्चित काल के लिए निष्कासन करना उचित नहीं है।

    इसके अनुसार, अदालत ने 14.08.2024 के निष्कासन आदेश रद्द किया और यूनिवर्सिटी को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को वापस ले, उसे अपना कोर्स पूरा करने दे और उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति दे। हालांकि, अदालत ने यह भी उम्मीद की कि याचिकाकर्ता संस्थान में अनुशासन बनाए रखेगा।

    Case Title : Akash Kumar v. Union of India and Ors

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