पटना हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट भर्ती में वेटलिस्टेड उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्देश रद्द किया, कहा- 'खामोश बैठने वाले' समानता का दावा नहीं कर सकते

Shahadat

26 March 2026 7:48 PM IST

  • पटना हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट भर्ती में वेटलिस्टेड उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्देश रद्द किया, कहा- खामोश बैठने वाले समानता का दावा नहीं कर सकते

    पटना हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि जो उम्मीदवार चयन पैनल के अस्तित्व में रहने के दौरान अपने अधिकारों का दावा करने में विफल रहते हैं, वे बाद में उन दूसरों के साथ समानता की मांग नहीं कर सकते, जिन्होंने समय पर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने दोहराया कि रिट राहत में देरी और लापरवाही के कारण रोक है और अनुच्छेद 14 "नकारात्मक समानता" के आधार पर लाभों के विस्तार की अनुमति नहीं देता।

    चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा की एक खंडपीठ (Division Bench) C.W.J.C. संख्या 10521/2022 में एक सिंगल जज द्वारा 09.07.2025 को दिए गए फैसले को चुनौती देने वाली लेटर्स पेटेंट अपील पर सुनवाई कर रही थी। सिंगल जज ने अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे बिहार सिविल कोर्ट में क्लर्क के पद पर नियुक्ति के लिए प्रतिवादी के मामले पर विचार करें और उसे वैसे ही लाभ दें जो समान स्थिति वाले अन्य उम्मीदवारों को दिए गए।

    यह विवाद रोजगार सूचना संख्या 01/2016 के तहत हुई भर्ती से जुड़ा था। इस भर्ती में प्रतिवादी का नाम वेटिंग लिस्ट में था, लेकिन कुछ उम्मीदवारों के ज्वाइन न करने के कारण कथित तौर पर रिक्तियां होने के बावजूद उसे नियुक्त नहीं किया गया।

    अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि रिट याचिका दायर करने में बहुत ज़्यादा देरी हुई, क्योंकि चयन पैनल की वैधता 26.09.2020 को ही समाप्त हो गई और प्रतिवादी ने जुलाई, 2022 में जाकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसके लिए उसके पास कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं था। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि 19.04.2023 को खंडपीठ द्वारा दिया गया पिछला फैसला केवल उन याचिकाकर्ताओं पर लागू होता था, जिन्होंने समय पर कोर्ट का रुख किया था। इसे सभी मामलों पर समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, यह भी दलील दी गई कि 2022 के नियमों के लागू होने और नई भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के साथ ही पिछली रिक्तियां (Vacancies) अब समाप्त मानी जाएंगी और उन्हें 2009 के नियमों के तहत भरा नहीं जा सकता।

    प्रतिवादी ने अपनी दलील में कहा कि वह भी उन समान स्थिति वाले उम्मीदवारों की तरह ही लाभ पाने का हकदार है, जिन्हें पहले सफलता मिली थी। उसने कहा कि उसे "खामोश बैठने वाला" (Fence-Sitter) नहीं माना जा सकता, क्योंकि रिट याचिका दायर करने से पहले उसने पिछली कानूनी कार्यवाही में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया था। शुरुआत में कोर्ट ने पाया कि इस विवाद के लिए कई कानूनी पहलुओं पर फ़ैसला सुनाना ज़रूरी था।

    इसलिए कोर्ट ने फ़ैसले के लिए चार मुद्दे तय किए:

    (i) क्या रिट याचिका को देरी, लापरवाही और सहमति के आधार पर खारिज किया जाना चाहिए, खासकर 2009 के नियमों के नियम 7 के तहत चयन पैनल की समय सीमा खत्म होने के संदर्भ में?

    (ii) क्या प्रतिवादी को "तटस्थ दर्शक" (Fence-Sitter) माना जा सकता है, जिसे कोई राहत पाने का अधिकार नहीं है, या उसने पूरी लगन से काम किया था?

    (iii) क्या सिंगल जज का यह निर्देश देना सही था कि नियम 7 और पिछली डिवीज़न बेंच के फ़ैसलों के आधार पर प्रतिवादी की नियुक्ति पर विचार किया जाए?

    (iv) क्या चुनौती दिए गए फ़ैसले में कोई ऐसी कानूनी कमी थी, जिसके लिए कोर्ट के अंदर ही अपील के अधिकार क्षेत्र में दखल देना ज़रूरी हो?

    मुद्दा I: देरी, लापरवाही और पैनल की समय सीमा खत्म होना

    कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि रिट याचिका साफ़ तौर पर देरी और लापरवाही के कारण खारिज होने लायक थी। कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी 22.07.2022 को ही कोर्ट आया था, जो कि 26.09.2020 को पैनल की समय सीमा खत्म होने के काफ़ी बाद का समय था। मई, 2022 में एक अंतरिम अर्जी के ज़रिए उसकी पिछली कोशिश भी पैनल की वैधता की समय सीमा के बाहर की थी। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि हालांकि रिट अधिकार क्षेत्र पर कोई सख़्त समय सीमा लागू नहीं होती। फिर भी देरी से जुड़े न्यायसंगत सिद्धांत पूरी ताक़त से लागू होते हैं। सबसे अहम बात यह है कि जब पैनल चालू था, तब कार्रवाई का कारण मौजूद था। फिर भी प्रतिवादी अपने अधिकारों का दावा करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि किसी दूसरे मुक़दमे के चलते रहने से किसी वैधानिक पैनल की समय सीमा बढ़ सकती है; कोर्ट ने कहा कि ऐसा नज़रिया भर्ती प्रक्रियाओं में निश्चितता को कमज़ोर करेगा और पुराने, बासी दावों को फिर से ज़िंदा कर देगा।

    मुद्दा II: क्या प्रतिवादी एक 'तटस्थ दर्शक' (Fence-Sitter) है?

    इस मुद्दे पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा विकसित "तटस्थ दर्शक" (Fence-Sitting) के सिद्धांत की विस्तार से व्याख्या की। कोर्ट ने साफ़ किया कि फ़ैसला करने वाला मुख्य कारक यह नहीं है कि मुक़दमा लड़ने वाला किसी पक्ष में फ़ैसले से पहले कोर्ट आया या बाद में बल्कि यह है कि क्या मुक़दमा लड़ने वाले ने तब कार्रवाई की जब कार्रवाई का कारण मौजूद था। इस कसौटी को लागू करते हुए, कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी संबंधित समय के दौरान सुस्त बना रहा और कोर्ट में तभी आया जब दूसरों को राहत मिल चुकी थी। कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि ऐसा आचरण साफ़ तौर पर 'तटस्थ दर्शक' (Fence-Sitting) के सिद्धांत के दायरे में आता है। इसने उन सतर्क वादियों के बीच अंतर किया जो सक्रिय रूप से अपने उपचारों का अनुसरण करते हैं और उन लोगों के बीच जो दूसरों के मुकदमों के परिणाम की प्रतीक्षा करते हुए "तटस्थ" बने रहते हैं; यह माना गया कि बाद वाले लोग अधिकार के तौर पर समानता का दावा नहीं कर सकते।

    मुद्दा III: नियुक्ति के निर्देश का औचित्य

    अदालत ने माना कि सिंगल जज का निर्देश कानूनी रूप से अस्थिर था। जबकि 2009 के नियमों के नियम 7(12)–(14) में मौजूदा और संभावित रिक्तियों को भरने के लिए मेरिट पैनल को दो साल तक चालू रखने का प्रावधान था, ऐसे संचालन के लाभ की व्याख्या पहले ही एक पिछले मुकदमे में डिवीजन बेंच द्वारा की जा चुकी थी। हालांकि, अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि उन निर्णयों से मिलने वाला लाभ केवल उन उम्मीदवारों तक सीमित था, जिन्होंने उचित समय के भीतर अदालत का रुख किया था। अदालत ने अपीलकर्ताओं की इस दलील को स्वीकार किया कि वे निर्णय 'इन पर्सोनम' (व्यक्ति-विशेष के लिए) थे, न कि 'इन रेम' (सभी के लिए)।

    इसके अलावा, अदालत ने इस तर्क को खारिज किया कि चूंकि न्यायिक आदेशों के परिणामस्वरूप कम अंकों वाले उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया, इसलिए प्रतिवादी भी इसी तरह की राहत का हकदार है। अदालत ने दोहराया कि अनुच्छेद 14 समानता की सकारात्मक अवधारणा को समाहित करता है और "नकारात्मक समानता" को मंजूरी नहीं देता है—अर्थात्, पिछली अनियमित या अदालत द्वारा निर्देशित नियुक्तियों के आधार पर लाभों का विस्तार करना। इस प्रकार, अदालत ने माना कि सिंगल जज ने देरी, आचरण और पिछले निर्णयों के सीमित दायरे की जांच किए बिना, केवल समानता के आधार पर राहत देने में त्रुटि की थी।

    मुद्दा IV: अपीलीय हस्तक्षेप का दायरा और निर्णय में त्रुटि

    अंतिम मुद्दे पर अदालत ने माना कि विवादित निर्णय में ऐसी मौलिक त्रुटियां थीं, जिनके कारण उसमें हस्तक्षेप करना आवश्यक हो गया। अदालत ने पाया कि सिंगल जज ने पिछले डिवीजन बेंच के निर्णय को गलत तरीके से सामान्य रूप से लागू होने वाला मान लिया था, बिना इस बात की जांच किए कि क्या वह निर्णय केवल अदालत के समक्ष उपस्थित पक्षों तक ही सीमित था। अदालत ने आगे पाया कि कम रैंक वाले उम्मीदवारों की नियुक्तियों पर अनुचित रूप से भरोसा किया गया, जिसके परिणामस्वरूप "नकारात्मक समानता" का एक अस्वीकार्य अनुप्रयोग हुआ। इसके अतिरिक्त, सिंगल जज प्रतिवादी के दावे पर देरी और शिथिलता (Laches) के प्रभाव पर पर्याप्त रूप से विचार करने में विफल रहे थे।

    अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि ये त्रुटियां स्थापित कानूनी सिद्धांतों के गलत अनुप्रयोग के समान थीं और मामले की जड़ तक पहुंचती थीं, जिससे अदालत के भीतर अपीलीय क्षेत्राधिकार में हस्तक्षेप करना उचित हो गया।

    तदनुसार, अपील स्वीकार की गई और विवादित निर्णय रद्द कर दिया गया।

    Case Title: The Patna High Court through its Registrar General and Ors v. Chandan Kumar and Ors.

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