मुखिया चुनाव में आरक्षण के लिए 1991 का आरक्षण कानून लागू नहीं होगा: पटना हाईकोर्ट
Praveen Mishra
24 Aug 2026 8:49 PM IST

पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि मुखिया पद के चुनाव में आरक्षण बिहार पंचायत राज अधिनियम, 2006 के तहत निर्धारित होता है, न कि बिहार आरक्षण अधिनियम, 1991 के तहत।
जस्टिस पार्थ सारथी की एकल पीठ ने जाति जांच समिति के फैसले और राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत 2021 में निर्वाचित मुखिया को पद से हटा दिया गया था।
मामला ग्राम पंचायत राज सहुरिया से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता 2021 के पंचायत चुनाव में अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के लिए आरक्षित सीट से मुखिया निर्वाचित हुआ था। उसके खिलाफ शिकायत की गई कि वह शेख समुदाय से संबंधित है, लेकिन उसने कथित तौर पर फर्जी तरीके से खुद को तेली (मुस्लिम) जाति का बताते हुए EBC प्रमाणपत्र प्राप्त किया।
जाति जांच समिति ने बिहार आरक्षण अधिनियम, 1991 में 2003 में किए गए संशोधन का हवाला देते हुए माना कि बिहार से बाहर रहने वाला व्यक्ति इस कानून के तहत आरक्षण का लाभ नहीं ले सकता। इसके बाद SEC ने याचिकाकर्ता को बिहार का स्थायी निवासी न मानते हुए उसे मुखिया पद से हटा दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि मुखिया पद के चुनाव में आरक्षण का वैधानिक आधार पंचायत राज अधिनियम की धारा 15(5) है। 1991 का कानून सरकारी पदों और सेवाओं में SC, ST और OBC के आरक्षण से संबंधित है। दोनों कानूनों का संबंध केवल पिछड़े वर्गों की जातियों की पहचान तक सीमित है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता को बिहार से बाहर रहने वाला व्यक्ति नहीं माना जा सकता। रिकॉर्ड के अनुसार, उसके पूर्वज करीब 125 वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के जौनपुर से बिहार आए थे और उसकी तीन-चार पीढ़ियां बिहार में रह चुकी हैं।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि जाति जांच समिति ने याचिकाकर्ता का जाति प्रमाणपत्र रद्द नहीं किया था और न ही यह निष्कर्ष दिया था कि वह तेली (मुस्लिम) के अलावा किसी अन्य जाति से संबंधित है।
इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि जाति जांच समिति और SEC ने 1991 के कानून और 2003 के संशोधन को मुखिया चुनाव में आरक्षण पर लागू करके गलती की। कोर्ट ने दोनों के आदेश रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को राहत प्रदान की।


